शनिवार, 25 सितंबर 2010

बर्तन सब साफ़ हैं

गले से लटकती हुई प्यासें
पेट से लटकती हुई भूखें

दरवाजे पर यूँ चलकर आती हुई भिन्डीयाँ
घी चुपड़ी पास बुलाती रोटीयाँ
थाली पर फैलती हुई दालें
कुकर के ढक्कन पर दस्तक देती चावलें

सब कुछ पलक झपकते गायब हो गया

रह गयी गले से लटकती हुई प्यासें
और अब भी पेट से लटकती हुई भूखें

- नीरज मठपाल
सितम्बर २५, २०१०

शनिवार, 11 सितंबर 2010

मेरा हृदय अब भी पहाड़ में बसता है

कदमों को विकास भी दिखा
नयनों को समंदर भी,
मन को साथी भी मिला,
समय को राह भी।

कुछ दूर भी हुआ
तो कुछ पास आया भी,
कुछ अलग वक्त को भी देखा
तो कुछ अलग वक्त ने दिखलाया भी।

कुछ अलग खुद को भी समझा
तो कुछ अलग खुद को समझाया भी,
आगे पीछे दिन रात भागते भी रहे
और रात दिन थमते रहे भी।

सोचा तो जाना भी
मेरा हृदय
अब भी पहाड़ में बसता है।

- नीरज मठपाल
सितम्बर ११, २०१०

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

काला सफ़ेद

देखा कि बाहर से झाँकते हुए
लम्बी कार के काले शीशों के
पीछे की दुनिया
कितनी सफ़ेद है।

लम्बाई की आड़ में
पहुँचने वाले काले गट्टों ने
सफ़ेद साये से पूछा,
दिखने के इस अंदाज को
सीखने से
क्यों हरवाना चाहता है।

सीखने ने दिखने से
नजर मिलाने को
इन्कार कर दिया और बोला,
देख, देख के बहुत सीख लिया
अब सीख, सीख के देख।

सफ़ेद शीशों के पीछे की
काली दुनिया को सीख
सफ़ेद गट्टों को काले साये
पहचान आने लगे।

- नीरज मठपाल
अगस्त ३१, २०१०

रविवार, 29 अगस्त 2010

फफूँदी

घर के किसी कोने में
दरी पर यूँ ही पड़ी
एक प्लेट ने उससे पूछा,
मैं तीन महीनों से उल्टी गिरी हूँ
फफूँदी का मैं अब घर बन चुकी हूँ
मुझे कब स्वच्छ पानी का
अमृत प्राप्त होगा?

फफूँदी हँसने लगी।

उसने चेहरे को प्लेट से
और दूर ले जाकर बुदबुदाया,
तू अकेली तो नहीं
सारे घर में सीलन है
उसी का पानी निचोड़
सब फफूँदी बन रहा है,
तू भी बन।

देखें पंचतत्त्व और ठोस पदार्थ में
भंगुरता किसे पहले दिखती है।
उसके मालिक ने कहा
घर को आग लगा दो !

लग गई आग।

इधर फफूँदी दूर किसी घर में
फिर हँस रही थी।

- नीरज मठपाल
अगस्त २९, २०१०