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सोमवार, 14 अप्रैल 2008

Ayyo Joshi


Once again, our loving Joshi is in news. This time not for wrong reasons :-) Today, He came out with all flying colors (in white) and won ethnic dress competition in his office.

Congratulations dadu! You rock as always. Enna raaskalaaa.. sis swoos swoos, his hwoos hwoss. Full rajni style :)

शनिवार, 1 मार्च 2008

Rock Star - Part 3 (Last Part)


वैलेंटाइन के जन्म दिन के उपलक्ष्य में हम आप लोगों के सामने रॉक स्टार की आखिरी किश्त लेकर हाजिर हुए हैं। संक्षेप में पहले इन दो विभूतियों का परिचय दूँ फ़िर आपको इनका एक वार्तालाप सुनाता हूँ।
पहली विभूती तो साक्षात चिंगारी है। नन्ही सी जान और चतुरता चतुर सिंह सी।
दूसरी विभूती की नॉएडा में हलवाई की दुकान है, इनकी मिठाइयों के पास मक्खियाँ तो खूब भिनभिनाती हैं, पर लड़की आज तक कोई नहीं फटकी।
चिंगारी अभी अभी लन्दन का एक राउंड मार के लौटा था, दिन १४ फरवरी का था तो वो पहुँच जाता है अपने हलवाई की दुकान में, कि क्या पता आज कुछ चमत्कार हो जाए। जैसे ही वह दुकान पर पहुंचता है तो देखता है कि जोरों से गाना लगा हुआ है -


"अजी रूठ कर अब कहाँ जाइयेगा,
जहाँ जाइयेगा, हमें पाइयेगा"

अब हम आपको इनका सीधा वार्तालाप सुनाने ले चलते हैं सीधे नोइडा कि उसी दुकान पर:


चिंगारी : अरे हलवाई क्या रे ऐसे ही जिंदगी बिगाड़ता रहेगा? पंजाब बैंक में पोस्ट निकली हैं । में तो भर रहा हूँ।
हलवाई : (मन ही मन में सोचता है) बहुत सयाना है। मुझसे ऐसा कह कह के ३-४ फार्म भरवा चुका है। पेपर के दिन ही पता चलता है वो तो सो रहा है आराम से। आज तो इसे ऎसी कड़वी जलेबी खिलाऊंगा की याद रखेगा।


चिंगारी : अबे किस सोच में डूब गया। सामने देख कस्टमर आयी है। ज्यादा मिठाई देना उसे।
हलवाई : (देखकर कस्टमर को सोचता है - हाय जालिम, काश में ख़ुद ही मिठाई होता, आज इनके थोड़ा नजदीक तो जाता। मेरे कानो में तो अब वायलिन भी बजने लगा है। दिन भी अच्छा है)

कस्टमर : अरे भाई साहब, कहाँ सोये हो? मिठाई तो आज ही दोगे न?
(बच्चा उर्फ़ चिंगारी जोर जोर से हँसने लगता है, हलवाई खिसिया जाता है)

हलवाई : (सोचता है - कसम से आज तो दुकान बंद करके स्मार्ट बन कर अपनी बाइक पर निकल जाना चाहिए किसी यूनिवर्सिटी कैम्पस में। और इस बच्चे को भी ले चलते हैं गिटार के साथ, क्या पता इस नमूने की पोज देखकर ही कोई आ जाए)


चिंगारी : (गाली देता है) आज दिन भर सोचता ही रहेगा या कुछ करेगा भी? आज तो तेरी मिठाई ना बिकेगी ज्यादा। ये दिन तो आइसक्रीम, फूलों और कार्ड्स का है। चल कहीं और चलें।

हलवाई : (तैयार होने लगता है पर फ़िर सोचता है - गधा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा क्या)
चिंगारी : इतना तो आशुतोष ने भी नहीं सोचा होगा जोधा अकबर बनाते समय, जितना तू सोच रहा है। क्या तेरा खून पानी हो गया है? क्या तुझे खानपुर कि गायों का दूध नहीं पिलाया गया बचपन में? क्या भारत की धरती ने सपूतों को जन्म देना बंद कर दिया है?

हलवाई : (इतना सुनकर जोश में आ जाता है, और दोनों निकल पड़ते हैं अपने वेलेंटाइन कि खोज में)


- नीरज मठपाल

फरवरी १५, २००८


पुनश्च : हम आपको बता दें कि आज फरवरी खत्म होने वाली है और आज भी ये दोनों लाल किले के पास डेरा लगा कर बैठे हुए हैं किसी के इंतजार में। ये थोड़ा अलग तरह के रॉक स्टार हैं। कोई बारिश , कोई तूफान इन्हें वहाँ से हिला नहीं सकता। हलवाई आज भी सिर्फ़ सोचता है, और बाकी तो चिंगारी साथ है ही ना।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008

Rock Stars - Part 2



ये हैं हमारे प्रिय पांडे जी। आदित्य कुमार पांडे, जो आजकल पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंगकर आदि कहलवाना पसंद करते हैं। तो ठीक है - आदि ही सही, कल जब ये अपनी फोटो अखबार के प्रथम पृष्ठ पर देखेंगे तो कहेंगे, “अरे गुरू जी, क्या कर दिया ये आपने। सर, कुछ तो ख्याल रखा होता आपने अपने बच्चे का”। हम भी कह देन, “अरे काहे का बच्चा, बजाय हारमोनियम को गले में लटका कर घूमने के गिटार पकड़ पकड़ फोटो खिचाय रहे हो और क्या बजाते हो उ झमा झाम झाम”। विदेशों तक उसकी आवाज पका रही है मियाँ।


ये लो जी हमारा इतना कहना था कि पांडे जी शुरू हो गए –

झमा झाम झम , झमा झाम झम (तार ही तोड़ेंगे आज तो):


इन द समर आफ सिक्सटी नाईन…
झमा झम झम, झमा झम झम।

......

......


मुझे लगा पहले से तो आम इंसान कुछ बजाता भी तो हारमोनियम, तबला और ढोलक। मंदिरों मे झाँझर जरूर बजती। हाँ, कभी कभी कोई स्टाइल मारने के लिए “ माउथ आरगन” बजा लेता था।


ओह, किस दुनिया की सोच रहा हूँ मैं। ये तो नया ज़माना है। ये तो २१वीं सदी कि युवा पीढ़ी है, इसका तो सिद्धांत है – “जो बिकता है, वही चलता है। गिटार बिक रहा है तो बजेगा भी वही”। कभी सोचता हूँ कि क्या आजकल के बच्चे भी डेस्क बजाते होंगे? क्या आजकल के बच्चे अपने टिन के पेंसिल बॉक्स को तोड़कर उसमें रबर बैंड बांधकर संगीत सुनते होंगे? शायद नहीं, ये पीढ़ी तो या तो म्यूजिक क्लास वाली है या फिर वीडिओ गेम वाली।


इसी सब में एक रोनी सी आवाज सुनाई दी –

अजीब दास्ताँ हैं ये, कहाँ शुरू कहाँ खतम,
ये मंजिलें हैं कौन सी, न वो समझ सके न हम।


मैं इधर उधर देख रहा हूँ कि यार ये कौन गधा रैंक रहा है। देखा तो छज्जे पर चढ़के अपने पांडे जी गाने भी लगे थे। हमें फौरन समझ मैं आ गया कि आज दिन अच्छा नहीं है। हमने आव देखा न ताव, फौरन चप्पल सर पर रख कर हम अपनी कुटिया की तरफ भागे।


पर आज भी एक प्रश्न सामने है - दो चार गाने बजाने तो पांडे जी ने सीख लिए। पर क्या कारण थे उनके गिटार शुरू करने के पीछे? कोई इश्क विश्क का सीन तो नहीं था? कोई ऐसी तो नहीं थी जो इन्हें सुबह ७ बजे फोन करके कहती थी, “आदि ! सुबह हो गयी, ब्रश कर लो और उसके बाद फिर मुझे फोन करो” और शाम को फोन करके कहती थी, “आदि ! आदि !! तुम अभी तक गिटार क्लास में नहीं गए, तुम्हें खाना खाना है कि नहीं आज़”। अब मरता बेचारा क्या न करता? आख़िर भूख का तो कोई इलाज ही नहीं होता है ना। हमारा आदि बेचारा भी बन गया रॉक स्टार।


और भना भन भन, झना झन झन... उसका गिटार बजाना आज भी जारी है। बजाये जा आदि, बजाये जा। लाटा टाइम्स तेरे साथ है।

- नीरज मठपाल

फरवरी ५, २००८

गुरुवार, 31 जनवरी 2008

Rock Stars - Part 1


दिल थाम के रखिये - हम आप को मिलाने जा रहे हैं कुछ रॉक स्टार्स से। वैसे तो प्रतिभा की कोई कमी नहीं, पर शुरूआत करते हैं हिमेश रेशमिया के भारी फैन डाक्टर पवन ध्यानी से।

हमारा ये रॉक स्टार हमेशा से ऐसा नहीं था। वह भी हमारी ही तरह एक सीधा सादा लड़का हुआ करता था। पर फरवरी २००६ की एक शाम राकेश कहीं से एक नया गिटार खरीद लाया। पूरे २५०० रूपये उस जादुई चीज पर खर्च किये गए थे। अब इस निवेश का कुछ तो फायदा उठाना था। तो उस दिन पूरा समर्पण फोटोग्राफी पर किया गया। ध्यानी जी कभी इस एंगल से फोटो खिंचवाते, तो कभी उस एंगल से। चीलनरेश अवध भी पीछे नहीं थे, तो फिर क्या था - उस दिन २४४ फोटो खींची गयी। राकेश ने म्यूजिक क्लासेज जाना शुरू कर दिया और ध्यानी ने अपने आफिस के प्रिंटर को म्यूजिक की सेवा में झोंक दिया। रोज हजारों पन्ने संगीत के अक्षरों से भरे हुए लाये जाते और जमकर रियाज होता, मानो हिमेश रेशमिया की आत्मा ध्यानी में समा गयी थी। सुबह सुबह वो कर्कश स्वर झेलना हमें पड़ता था। रोज ऊपर वाले से गुहार लगाते की उठा ले रे बाबा उठा ले, इस गिटार को उठा ले। राकेश के सर का भूत तो ४-५ दिन में ही उतर गया, पर ध्यानी जी के गायन को हमें महीने भर झेलना पड़ा। बस यही सकून था कि आख़िर निजात तो मिली। वो गिटार १८०० रूपये में एक महीने बाद बेच दिया गया।

बाद में सुनने में आया कि विजय ने भी एक गिटार खरीदा जिसने कई और रॉक स्टार्स को जन्म दिया। ध्यानी जी का जन्म फिर से हुआ। फिर से कई सारी फोटो खींची गयी, कई सुरों को बेसुरा किया गया और कई सज्जन इंसानों के कान फोड़ दिए गए। पर अन्तिम परिणाम वही - ढाक के तीन पात।

आजकल जिसे देखो गिटार बजाने - सीखने की धुन है। जो बचा, उसे गिटार के साथ फोटो खिंचवाने की धुन है। मानो गिटार ना हुआ, अलादीन का चिराग हो गया।

आज के लिए इतना ही, पर हम आगे आने वाले भागों में गिटार की महिमा का और जाप करेंगे। अभी तो कुछ और भी रॉक स्टार बाकी हैं। तो फिर कीजिए थोड़ा सा इन्तजार ...

(Double click the snap above and check it out for summary:-)

- नीरज मठपाल
जनवरी ३१, २००८

शुक्रवार, 15 जून 2007

पीचीम समझौता - एक ऐतिहासिक फैसला


कुछ दिन पूर्व जी टाक पर एक शिखर वार्ता का आयोजन किया गया। इसमें लेड़ू देश के राजा ‘पी’ , चीलनरेश ‘ची’ , लाटा साम्राज्य के अधिपति ‘म’ ने प्रतिभाग किया। वार्ता का परिणाम एक ऐतिहासिक फैसला है, जो आने वाले कल में इन महान देशों का भविष्य तय करने की सामर्थ्य रखता है। ज्ञात रहे कि ये तीनों विभूतियाँ एक ज़माने में एक साथ केदार छात्रावास के कमरा नंबर २०१ की शोभा बड़ा चुकी हैं।

वार्ता इस बात से शुरू हुई कि म के बच्चों को अब एक और प्रश्न का सामना करना पड़ेगा – “भारत की पहली महिला राष्ट्रपति का नाम बताइए?” आने वाले समय में बच्चों पर और भी काफी प्रश्न लादे जा सकते हैं।


तो इसके लिए राजा म ने सुझाव दिया कि क्यों न कुछ इस तरह की योजना बनाई जाये कि सभी एक ही समय पर बच्चे पैदा करें। इससे बच्चों को “कम्बाइन्ड स्टडी” करने का अवसर मिलेगा और माता पिता पर भी कम दबाव रहेगा। राजा पी ने इस सुझाव का सहर्ष स्वागत किया। किन्तु उनकी एक समस्या थी – प्रेमरोग की। जिसके कारण उन्हें शादी की थोड़ा जल्दी है। तो बच्चों के लिए उन्हें काफी इन्तजार करना पड़ जाएगा – बाकी लोगों की शादी होने तक। समस्या का समाधान ये निकला कि पी के दूसरे बच्चे के साथ तालमेल बिठाया जाएगा और जरूरत पड़ी तो पहले बच्चे को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाएगा।


वार्ता में नया मोड़ तब आया जब राजा ची ने अपना मुँह खोला। उनका कहना था कि वो इस “स्कीम” पर अपना एक बच्चा तो कुर्बान करने की सोच सकते हैं, लेकिन उनकी पहले से एक और योजना है, “अपना बच्चा बाकियों के बच्चे के ठीक एक साल बाद पैदा करना है। इससे किताबें और कापियां फ्री में मिल जाया करेंगी। मेरा बच्चा अपने ददा और दीदीयों की किताबें पढ़ेगा।”


इस पर आवेशित होकर राजा पी ने कहा, “हमें राजा ची जैसे भिखारियों को अपनी इस योजना में शामिल करने की जरूरत नहीं है। हमें तो उन साहसी लोगों की जरूरत है, जो हमारे बच्चों के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकें। उनके एक साल पीछे पीछे नहीं।”

कुल मिलाकर इस फैसले के बाद दो धाराएँ निकलकर सामने आयी:-


१ - वो राजा जो अपने राजकुमार और राजकुमारियां लगभग एक ही समय पर पैदा करेंगे।


२- वो राजा (भिखारी), जो अपने बच्चे ऊपर पैदा हो चुके बच्चों के ठीक एक साल बाद पैदा करेंगे।


आप सभी मित्रगण भी इन दोनों धाराओं में से किसी एक में शामिल होने के लिए आमंत्रित हैं। ध्यान रहे कि आपका निर्णय कल को इतिहास बदलने की ताक़त रखता है। इसलिये सोच समझकर निर्णय लें। आख़िर सवाल आपके बच्चों के ही नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य का है।

(इस फैसले को पढ़ने के बाद किसी का मन हम पर जूते मारने का कर रहा है, तो कृपया अच्छी ब्रांड के नए जूते ही मारें। आख़िर हमारा भी कोई “स्टैंडर्ड” है। कष्ट हेतु धन्यवाद।)


- नीरज मठपाल


जून १५, २००७

गुरुवार, 3 मई 2007

लम्बू मोटू - भाग ४ (अन्तिम भाग)


(सलाह - अन्तिम भाग पढ़ने से पहले भाग १, २ एवं ३ पढ़ लें।)

आइये ठाकुर से मिलें। यह ‘क्लीन शेव्ड’ चेहरा जो आप देख रहे हैं, कभी इस शख्स की घनी दाढ़ी – मूंछें हुआ करती थी। इसकी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी ‘ट्रेजेडी’ यह है कि इसे दो बार प्यार में धोखा मिल चुका था। पहली बार के धोखे के दुःख में इसने दाढ़ी काट ली और दूसरी बार के बाद मूंछे। देखना बाकी है कि इसके तीसरे प्यार का क्या होता है। चलिये अब भाग ३ से आगे को बढ़ते हैं -

गोलियों की आवाज़ सुनकर ठाकुर बाहर निकलता है, पर आस पास कोई नजर नहीं आता। बस अंधेरे में गोलियों की आवाज़ सुनाई देती है। थक हारकर वो वापस आकर सो जाता है।

अगली सुबह सूर्य की किरणें जब अपनी रश्मियां बिखेर रही होती हैं, जब ठंडी हवा और चिडियों का कलरव मंदिर की घंटियों के साथ मिलकर मधुर संगीत की झंकार उत्पन्न कर रहा होता है। तभी माँ भवानी का भक्त ठाकुर अपने गुर्गों लव गुरू और सिट्टू के साथ मंदिर की तरफ जाता है। वहीं मंदिर मे एक सुन्दर लड़की पूजा अर्चन कर रही होती है। उसकी लटें बार बार आंखों पर आ रही होती हैं, जिन्हे वो हवा के साथ उड़ने दे रही होती है। आरती करके जैसे ही वो पलटती है, ठाकुर की नजरें उससे टकराती हैं और ठाकुर को ‘लव एट फर्स्ट साइट’ हो जाता है। ठाकुर उसे ठकुराइन बनाने का फैसला कर लेता है।

लेकिन ठाकुर को यह पता नहीं था कि असल में वह सुन्दर लड़की एक आंख से भेंगी थी और वह उस समय ठाकुर को नहीं बल्कि लव गुरू को देख रही थी। उस शांत मनोहर पवित्र वातावरण में एक ‘लव ट्रायंगल’ ने जन्म ले लिया था।

अब ठाकुर की ज़िन्दगी में दो क्रम रोज की बात बन जाते हैं – एक रात को गोलियों के चलने की आवाज सुनना और दूसरा सुबह सुबह मंदिर जाना। इसके साथ ही एक और क्रम चोरी – चोरी, चुपके चुपके चलते रहता है – ‘लव गुरू और ठकुराइन का प्रेम प्रसंग’। एक दिन वो दोनों चुपके से शादी भी कर लेते हैं। इस शादी से बेखबर जालिमों का जालिम ठाकुर अपने दिल की बात ठकुराइन से कभी कह नहीं पाता।

अब ये समझने के लिए तो कोई ‘राकेट साइंस’ चाहिये नहीं कि आज लव गुरू चाय के ठेले पर क्यों है। जी हाँ, जब ठाकुर को सच का पता चला, तो उसके लिए ये सदमे से कम नहीं था। उसने लव गुरू और ठकुराइन की जान को तो बख्श दिया, पर ये भी सुनिश्चित कर दिया कि लव गुरू ज़िन्दगी भर चाय का ठेला चलाते रहे। ठकुराइन लव गुरू के वियोग में पागल हो गयी और आज भी मंदिर की चौखट पर उसका इंतजार कर रही है।

सदमे से पहले ही भन्नाये हुए ठाकुर को जैसे ही उस रात गोलियों की आवाज़ सुनाई देती है, वो ग़ुस्से में अपने तमंचे, कट्टे और सुतली बम लेकर निकल पड़ता है। पूरा इलाका छानने के बाद उसे वो घर दिख जाता है जहाँ से गोलियों की आवाज आ रही होती है। जब वह उस कमरे के दरवाजे के पास पहुँचता है तो देखता है कि एक पक्षी वहाँ कम्प्यूटर पर कुछ खटर बटर कर रहा है।

असल में पक्षीराज चील एक खूनी कम्प्यूटर गेम खेल रहा होता है और पूरे इलाके के स्पीकर उसी से ‘कनेक्टेड’ होते हैं। वही गेम नेटवर्किंग के जरिये लम्बू मोटू भी खेल रहे होते हैं। उसी गेम से दिशाओं को चीरती सी गोलियों की आवाजें आ रही होती हैं।

ग़ुस्से से पागल ठाकुर चील को गोली मारने को तैयार हो जाता है और कहता है – “इन गोलियों की आवाजों ने मुझे बहुत दिनों से पागल कर रखा है। तू जानता नहीं कि मेरे इलाके में बच्चा – बच्चा कट्टे , तमंचे और सुतली बम लेकर घूमता है। आज तो तू गया काम से। अपनी आखिरी इच्छा बता”।

यह सब सुनकर पक्षीराज की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती है। डरते मरते वह धीमी आवाज़ में कहता है – “मैं इसका दोषी नहीं। इस गेम को यहाँ लाने और ‘फुल वाल्यूम’ में बजाने के लिए लम्बू – मोटू जिम्मेदार हैं। मेरी आखिरी इच्छा यही है कि आप मेरे से पहले लम्बू – मोटू को मार दें”।

ठाकुर के राजी होने पर पक्षीराज उसे लेकर लम्बू – मोटू के कमरे की तरफ उड़ता है। सारी बात जानकर लम्बू – मोटू ठाकुर को ‘चैलेंज’ करते हैं – “तूने कट्टे – तमंचे बहुत चलाये, मर्द है तो हमें इस कम्प्यूटर गेम में हराकर दिखा”। ठाकुर का स्वाभिमान जाग उठता है और वह गेम खेलने के लिए तैयार हो जाता है।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि ठाकुर लम्बू – मोटू से गेम हार जाता है। पर आश्चर्य यह है कि वह उन्हें जिन्दा छोड़ देता है और प्रण करता है कि वह एक दिन उन्हें उस गेम में हराकर दिखायेगा। सब कुछ छोड़ छाड़ कर वह दिल्ली आ जाता है।

तब से ठाकुर दिल्ली में मजे कर रहा है। गेम जीतना तो दूर की बात है, उसे अभी तक कम्प्यूटर खोलना और बंद करना भी नहीं आया है। स्वामीभक्त सिट्टू भी उसकी सेवा करने दिल्ली ही आ जाता है। आजकल वही उसके लिए खाना बनाता है, घर साफ करता है, उसके कपड़े धोता है, उसके पाँव दबाता है। लम्बू मोटू अपनी अपनी कम्पनी में अपनी नौकरी बजा रहे हैं। दोनों ख़ुशी और मस्ती की ज़िन्दगी जी रहे हैं।

हम भी आप लोगों से विदा लेते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि आगामी नवंबर तक ठाकुर की ज़िन्दगी में कोई ठकुराइन आ जाये। अरे हाँ, पाठकों से निवेदन है कि वो लव गुरू और पागल ठकुराइन को मिलाने में अपना सहयोग दें। उस पगली की ताजा फोटो आपकी जानकारी के लिए ऊपर चिपका दी गयी है।


- नीरज मठपाल
मई ३, २००७

बुधवार, 2 मई 2007

लम्बू मोटू - भाग ३


(सलाह – भाग ३ पढ़ने से पहले भाग १ एवं भाग २ जरूर पढ़ लें।)

आज देखें कैसे शुरू होता हैं लम्बू – मोटू का कन्डोलिया का सफ़र।

लम्बू पिथौरागढ़ में अपनी हरकतों से पूरे कस्बे की नाक में दम करे रहता था। वह किसी तरह नक़ल मारकर बारहवीं पास कर लेता है। उसके बाद उसकी संगत बहुत ही खराब हो जाती है। ढौंडू हलवाई की दुकान के बाहर बैठकर दिन भर ताश खेलना और दम पीना ही जैसे उसके लिए ज़िन्दगी हो। ढौंडू कहने को तो हलवाई था, पर उसका असल धंधा था - गांजा, अफीम, चरस की स्मगलिंग करना। सही कहते हैं कि हमेशा सज्जनों की संगति करनी चाहिए। पर उम्र के इस नाजुक मोड़ पर लम्बू को एक ऐसा दोस्त मिल गया था, जिसके होते हुए इन्सान को जहर की भी क्या जरूरत।

दूसरी तरफ झाँसी के बियाबानों में मोटू का भी कुछ कुछ ऐसा ही हाल था। उसकी ज़िन्दगी को जहर बनाने वाला कोई ग़ैर नही उसका अपना चाचा था, जिसे वो प्यार से कभी पापा तो कभी डैड बुलाया करता था। यह डैड उसकी ज़िन्दगी का ड्रैकुला था। दोनों दिन रात साथ बैठकर अफीम फांकते रहते थे। इस अफीम की लत से डैड तो ३४ किलो का रह गया पर मोटू का वजन २३४ किलो को भी पार कर गया। अब वह हाथी का अंडा नहीं, बल्कि हाथी ही नजर आने लगा था।

ऐसे में जब सारी आशाएं ही जवाब देने लगी थी, जब लगा था कि ये दो जिंदगियां नशे की लत के कारण बरबाद हो जायेंगी, इनकी जिन्दगियों में एक मनीषी का प्रवेश होता है।

नेपाल सीमा पर एक छोटा सा क़स्बा है – टनकपुर। वहाँ के एक सामाजिक कार्यकर्त्ता ने ड्रग्स लेने वाले युवाओं को इस असाध्य रोग से निजात दिलाने का बीड़ा उठाया था। वह नगर – नगर, गाँव – गाँव नंगे पैर इन ड्रग्स से दूर रहने का संदेश फैलाते हुए चलते थे। हजारों का जन समूह उनकी इस यात्रा मे उनके साथ शामिल हो चुका था। असल मायनों में वही इकलौते सच्चरित्र एवं योग्य नेता थे। घूमते घूमते इनकी मुलाक़ात अलग अलग जगहों में लम्बू और मोटू से हुई। लम्बू और मोटू शरीर, समाज और उन्नति के इस शत्रु “ड्रग्स” के बारे में नेता जी के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उनके शिष्य बनने को तैयार हो गए। उसी दिन उनकी ड्रग्स की बुरी आदत भी छूट गयी।

नेता जी की दूरदर्शी सोच कुछ और ही थी। उन्होंने लम्बू – मोटू को कन्डोलिया जाकर कम्प्यूटर में उच्च शिक्षा ग्रहण करने का आदेश दिया। लम्बू – मोटू ने जुगाड़ लगाकर कन्डोलिया की प्रतिष्ठित “घसीटाराम टाइमपास यूनिवर्सटी” में दाखिला ले लिया।

वो कहावत तो आपने सुनी ही होगी – “ चोर चोर मौसेरे भाई ”। पहले ही दिन लम्बू और मोटू में पक्की यारी – दोस्ती हो गयी। दोनों दिमाग से तो पैदल थे ही पर फिर भी "एग्जाम्स" में बाकी लड़कों की कापियां छाप छाप के दोनों एक के बाद एक सेमेस्टर पास करने लगे। ऐसा करते करते ये दोनों “कापी – पेस्ट” में “एक्सपर्ट” हो गए। तब शायद इन्हें भी पता नहीं होगा कि “कापी – पेस्ट” में विशेष महारथ इन्हें “साफ्टवेयर फील्ड” में बहुत आगे ले जायेगी।

वहीं इनकी दोस्ती गेम बजाने में मास्टर 'पक्षिराज चील' से भी होती है। ये गेम मास्टर वैसे तो बहुत पहुँची हुई चीज हैं, लेकिन ये कहानी इस चरित्र की ‘ डिटेल ’ में जाने की इज़ाज़त नहीं देती। कहानी में इसका योगदान सिर्फ एक बिचौलिए का है जो ठाकुर की मुलाक़ात लम्बू – मोटू से कराता है। फिलहाल हम आपको इसका एक ‘ डायलाग ’ बताकर आगे बढ़ते हैं – “ जब किसी घसीटाराम टाइमपास यूनिवर्सटी के बन्दे का कटता है, तो मुझे बहुत ख़ुशी होती है ”।

इस सबके बीच समय आराम तलबी और मस्त लाइफ के पंखे लगाकर धीरे धीरे आगे बढ़ता है और लम्बू – मोटू “ फाइनल ईयर ” में आ जाते हैं।

यही वो समय है जब ठाकुर अपने साथ लव गुरू और सिट्टू को लेकर “ समर वेकेशन ” बिताने कन्डोलिया आता है। ठाकुर के इस दौरे का एक और मकसद है - अपने लिए ठकुराइन ढूँढना। सब कुछ कुशल – मंगल चल रहा होता है, तभी एक रात ठाकुर को अपने होटल के कमरे के पास कई गोलियों के चलने की आवाज आती है। धाड़ ... धाड़ … धाड़ …

(ठाकुर के होटल के पास गोलियाँ चलाने वाला कौन था? क्या लम्बू – मोटू और ठाकुर मे लड़ाई होती है? ठकुराइन का क्या किस्सा बनता है? लम्बू, मोटू, ठाकुर, लव गुरू, सिट्टू अपने अंजाम तक क्यों और कैसे पहुंचते हैं?

आपके दिमाग में उठ रहे इन सब सवालों के जवाब लेकर जल्द ही हाजिर होगा - कहानी का चौथा और अन्तिम भाग …)
- नीरज मठपाल
मई २, २००७

मंगलवार, 1 मई 2007

लम्बू मोटू - भाग २


(सलाह – भाग २ पढ़ने से पहले भाग १ जरूर पढ़ लें।)

आप भी सोचते होंगे आज तस्वीर में ये दो नमूने कौन दिख रहे हैं। यदि आप सोचते हैं कि इनमें से एक ठाकुर है, तो आप बिल्कुल गलत हैं। लेकिन यही वो दो शख्स हैं जो आज ठाकुर को चम्बल से दिल्ली लाने के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिये लम्बू – मोटू और ठाकुर की कहानी आगे बढ़ाने से पहले इन दोनों नमूनों को जान लेना भी बहुत जरूरी है।

जो माला लगा कर ‘पोज’ दे रहा है, वो अपने को ‘लव गुरू’ कहता है। पर असल मे उसकी एक गरीब बस्ती में चाय की दुकान है। अजी, दुकान भी क्या, बस ये समझ लीजिये कि एक जगह पर एक ठेला खङा है। उसी ठेले पे ये लव गुरू रात को सो भी जाता है। ये हमेशा से ऐसा नहीं था। कभी ये ठाकुर का बाँया हाथ हुआ करता था। पर वो कन्डोलिया में बिताया एक महीना ……

दूसरा जो कभी सिंटौले पक्षी की तरह चम्बल के जंगलों में आज़ाद घूमा करता था, हर समय अपने मधुर आवाज में गाया करता था – “ कोयल सी मेरी बोली … सिट्टू – सिट्टू …”। आज ठाकुर का ‘पर्सनल बावर्ची’ बनकर दिन रात उसकी गुलामों की तरह सेवा कर रहा है। ये हमेशा से ऐसा नहीं था। कभी ये ठाकुर का दाँया हाथ हुआ करता था। पर वो कन्डोलिया में बिताया एक महीना ……

उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसा और देवदारू के वृक्षों से घिरा यह कन्डोलिया वही जगह है जहाँ लम्बू और मोटू पहली बार एक दूसरे से मिले थे। यह वही जगह है जहाँ ठाकुर अपने दल बल के साथ ‘समर वेकेशन’ पर गया था। और हाँ, यही वह जगह है जिसने इन सबकी ज़िन्दगी बदल कर रख दी।

(ठाकुर के साथ कन्डोलिया में क्या हुआ? क्यों लव गुरू और सिट्टू की ज़िन्दगी बरबाद हुई? लम्बू – मोटू कन्डोलिया में क्या कर रहे थे? इन सब सवालों के जवाब देती कहानी का अगला भाग किसी और दिन …… )

- नीरज मठपाल
मई १, २००७

सोमवार, 30 अप्रैल 2007

लम्बू मोटू - भाग १


( प्राक्कथन - इस घटना के सभी पात्र काल्पनिक हैं। यदि कोई पात्र यथार्थ से मिलता जुलता है, तो इसे संयोग मात्र समझें।)

सन १९८३ की बात है। तब चम्बल के बीहड़ इलाक़ों मे ठाकुर विजय पाए सींग का राज चला करता था। पुलिस ठाकुर के नाम से थर थर कांपा करती थी। जब कोई बच्चा रोता था तो माँ बच्चे से कहती थी - "बेटा सो जा वरना ठाकुर आ जायेगा"। ये बड़े ही दुखों के दिन थे।

ऐसे मे झाँसी और पिथौरागढ़ की वीर भूमियों पर दो महापुरुषों ने जन्म लिया। बादल इस ख़ुशी में ख़ूब बरसे। हाथियों ने खुश होकर अंडे दिए और जिराफों ने अपनी ऊंची ऊंची गर्दनें मटकायी। पूरे संसार मे रौनक सी आ गयी।

दोनों ही बच्चे बड़े होने लगे। एक पहाड़ों की पथरीली जमीनों में 'स्कूल' से 'बंक' मारकर पिक्चर हॉल जाता था, तो दूसरा झाँसी के टीलों में छिपकर ठाकुर कि हवेली में चलती हुई नौटंकी देखा करता था। ' बालीवुड' दोनों का कैरियर बरबाद करने में तुला था। दोनों में एक बात और 'कॉमन' थी। दोनों छोटे बच्चों की एक पत्रिका 'लोटपोट' के बहुत बड़े फैन थे। तब शायद इन्हें यह पता नहीं था कि एक दिन इन दोनों की जोड़ी "लम्बू - मोटू" के नाम से विश्व विख्यात होने वाली है।

खैर दोनों बड़े होते हैं। इसमें कोई खास बात नहीं क्योंकि बड़ा तो सबको होना ही पड़ता है। पर उनमें से एक सात फ़ीट की लम्बाई को पार कर जाता है तो दूसरे के भार को तोलने के लिए १८० किलोग्राम के पलड़े भी कम पड़ते हैं।

भाग्य की विडम्बना देखिए कि आज ये दोनों 'साफ्टवेयर लाइन' में काम करते हैं और ठाकुर राजधानी दिल्ली में आज भी मजे से आज़ाद घूम रहा है। हल्द्वानी की बड़ी - बड़ी नहरों का पानी तो आज भी नहीं सूखा है, पर फिर भी न जाने कौन सी क़सम है कि आज लम्बू - मोटू मौन हैं।

(ठाकुर कौन था और चम्बल से दिल्ली कैसे पहुँचा? क्यों लम्बू – मोटू ठाकुर को पकड़ नहीं पाए? लम्बू मोटू से कब मिलेगा? क्या ये ठाकुर का राज ख़त्म कर पायेंगे? अजूबे चरित्रों की इस कहानी का अगला भाग कभी और ..... )

- नीरज मठपाल
अप्रैल ३०, २००७

रविवार, 29 अप्रैल 2007

थोड़ा अनुमान लगायें


कुछ महीनों पहले तक नवीन (कोटी) और सुरेन्द्र (बच्चा) एक ही कम्पनी में काम करते थे। एक दिन दोनों किसी पिकनिक पार्टी में जाते हैं। एक फोटो के आधार पर लाटा टाइम्स पेश करता है उन दोनों के बीच हुई काल्पनिक बातचीत:-

बच्चा: अरे भुक्खड़! ज़रा आराम आराम से खा। कोई लेकर भागने वाला नहीं है तेरा खाना।
कोटी : यार जिन दिनों किस्मत खराब चल रही हो, उन दिनों करना पड़ता है। फिर तेरी प्लेट की इमरती पर भी तो नजर है। (हँसता है)

बच्चा: हाँ बेटा, क्यों नहीं। तेरे को तो मैं इमरती क्या, पूरा खाना ही खिलाऊंगा।
कोटी: अरे हद हो गयी, लंदन जाने वाला है। एक पार्टी देना तो दूर, तू तो एक इमरती भी खिलाने से मना कर रहा है। (मन ही मन में सोचता है - बच्चे से पार्टी लेना तो बहुत ही टफ काम है)

बच्चा: ठीक है भई। तू खुश रह। ये ले, मर (इमरती देता है)
कोटी (अपना सारा खाना चट करने के बाद) : वाह बच्चे, मजे आ गए।

बच्चा: सयाने, बच्चा होगा तू। तू अभी मेरी अल्मोड़ा स्पेशल चाल को नहीं जानता (हँसता है)। मैं जब किसी का काटता हूँ तो हवा को भी खबर नहीं होती।
कोटी (जोर से हंसते हुए): वो तो अब पूरी दिल्ली को पता है। लंदन वालों की भी किस्मत जल्दी फूटने वाली है।

बच्चा (शरमाते हुए टापिक बदलता है): डैड (जोशी) बड़ा चालू है यार। मेरी शर्ट मार के बंगलौर भाग गया।
कोटी: तेरी क़सम!!! तेरी तो शर्ट ही मारी। मेरी तो पैंट भी मार के ले गया है एक। एक सफ़ेद रंग का 'रूमाल' भी नहीं छोड़ा उसने। छोडूंगा नहीं उसको तो मैं।

बच्चा: पहले पकड़ तो सही। (हंसता है) वैसे मैं तो धपोला के यहाँ इस 'वीक एंड' जा रहा हूँ दो-चार चीजें मारने।
कोटी: ठीक है। तू ऐश कर। मुझे तो अपनी ड्यूटी बजानी है (उदास होने का दिखावा करता है)।

(दोनों खाने की दूसरी प्लेट लेने चले जाते हैं। लाटा टाइम्स की कल्पनाओं का तार भी टूट जाता है। कोशिश जारी रहेगी कि ये तार फिर से कभी 'कनेक्ट' हो)

- नीरज मठपाल
अप्रैल २९, २००७

सोमवार, 23 अप्रैल 2007

जोशी जी - एक बातचीत


मनोज जोशी यूँ तो २८ वर्ष के हैं, लेकिन आज भी उनमें २० वर्ष के युवा की तरह जोश बरकरार है। वे भारत की एक बड़ी साफ्टवेयर कम्पनी मे ' कन्सल्टैंट ' हैं। आजकल वे काम के सिलसिले में सिंगापुर में हैं। लाटा टाइम्स ने उनसे गूगल टाक पर बात की। पेश हैं इस बातचीत के मुख्य अंश -

लाटा - जोशी जी नमस्कार

मनोज - नमस्कार

लाटा - आपको अपने बारे में एक ' लाइन' कहनी हो तो क्या कहेंगे?

मनोज - आदमी मुसाफिर है , आता है जाता है। यही सच है।

लाटा - आज आप एक कामयाब इन्सान हैं। आप अब तक के अपने जीवन को सफल कहेंगे?

मनोज - सफल भी और नहीं भी। सफल इसलिये कि कमजोर तबके से 'कम्पेयर' करें तो 'लाइफ' अच्छी लगेगी और मजबूत तबके से 'कम्पेयर' करें तो खराब।

लाटा - देश से बाहर सिंगापुर में आपका सबसे अच्छा अनुभव क्या रहा?

मनोज - (कुछ सोचकर) हम दूसरे देश को महान नहीं कहते चाहे हम यहाँ कितने भी 'सेफ' हों, कितनी ही 'फैसिलिटी' हों क्योंकि हमें कहीं न कहीं अपने देश और अपने दोस्त याद आते हैं। हम असल में देश को नहीं, अपने दोस्तों और 'फैमिली' को 'मिस' करते हैं। इसलिये हमें कभी विदेश अच्छा लग ही नहीं सकता। चाहे हम इंडिया जाकर दोस्तों से कई समय तक न मिल पायें, फिर भी विदेश जाकर उन्हें ज्यादा 'मिस' करते हैं।

लाटा - तो आपके लिए दोस्ती के क्या मायने हैं?

मनोज - सभी 'सैलफिश' होते हैं। ठीक भी है। दोस्तों के बीच हम कई बातें 'शेयर' कर सकते हैं। हँस सकते हैं। रो सकते हैं। किसी की भी , कितनी भी जला सकते हैं। जब मर्जी तब ग़ुस्सा हो सकते हैं। ये सब 'फैसिलिटी' एक साथ कहाँ मिलेगी (जोर जोर से हँसते हुए), बात में दम है कि नहीं।

लाटा - बिल्कुल, बहुत दम है। बीच में आपके 'अफेयर' की चर्चाएँ गरम थी। आप 'लव' और 'अफेयर' के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

मनोज - देखो 'लव' किस चिड़िया का नाम है, ये हमें नहीं पता। हाँ हम इस उम्र में होने वाले आकर्षण का शिकार जरूर हुए, पर सिंगापुर आने के बाद हमें सच्चाई पता चल गई। बाकी आप खुद समझदार हैं।

लाटा - आप इंडिया आकर सबसे पहले क्या करना चाहेंगे?

मनोज - दिल्ली जाकर दोस्तों से मिलना चाहेंगे और साथ बैठकर 'दारू' पीना चाहेंगे।

लाटा - परिवार कि आपके जीवन में क्या अहमियत है?

मनोज - बहुत ज्यादा। माता, पिता, भाई, बहिन, रिश्तेदार और भरोसे के दोस्त परिवार में आते हैं। भरोसे का मतलब पैसा कतई नहीं है। भरोसा एक सोच है जो अपने आप पैदा होती है। शायद माया के जाल में हर आदमी की एक सोच पैदा होती है।

लाटा- आप अपनी 'प्रोफेशनल लाइफ' के अनुभवो के बारे में संक्षेप में कुछ बताना चाहेंगे?

मनोज - देखो भाई, एक सच्ची बात तो ये है कि जुगाड़ ही सबसे बड़ा 'टूल' है। जुगाड़ ही सब चीजों का बाप है। इसके लिए शुक्ला जैसे बातूनी, लाटे जैसे चतुर और परवाल की तरह 'प्रायोरिटी' पता होनी चाहिऐ। बुद्धि का प्रयोग एक प्रतिशत से ज्यादा नहीं।

लाटा - आप लाटा टाइम्स के पाठकों के लिए कुछ कहना चाहेंगे?

मनोज - इसको पढ़ते रहिए और लाटे को अपना सहयोग दीजिए।

लाटा - धन्यवाद, हम आपके सफल जीवन की कामना करते हैं।


(अमेरिका से नीरज मठपाल, अप्रैल २३, २००७)

रविवार, 22 अप्रैल 2007

राकेश की शादी - बारात डांस


आज ऐसे ही ख़्याल आया कि दोस्तों के शानदार हाल समाचारों और कर्मों का वर्णन किया जाये। वैसे भी यही लोग मेरे लिखे हुए के इकलौते पाठक रहे हैं। गलती इनकी नहीं है। जब विकल्प ही नहीं हो कहीं भागने का, तो ये लोग कर भी क्या सकते हैं। फिलहाल मैं ज्यादा भूमिका ना बांधते हुए उद्देश्य की तरफ बढ़ता हूँ। गप-शप और चर्चाओं का केंद्र चीन-ओ-मंगोलियन नरेश राकेश चंद्र सिंह परवाल की शादी रही। आप उनका प्रसन्न चेहरा तो देख ही रहे हैं। जब शाहजहाँ की शादी हुई होगी, तब वो भी इतना खुश नहीं हुआ होगा। लेकिन मेरा मित्र समाज इस बात से ज्यादा खुश रहता है कि उन्हें जमकर नाचने का मौका मिलेगा। किसी घरेती कि मजाल कि वो हम लोगों के डांस की तारीफ करे बिना रुखसत हो जाये। अजी शराबी तो शराबी, सुबह - शाम पहाड़ी ठंड में पैकेट के दूध की चाय पीने वाले भी ' प्रोफेशनल डांसर्स ' को मात देते नजर आते हैं। दूल्हे को सजाने में उतना टाइम नहीं लगता जितनी ये बारातियों कि अलबेली टोली एक दूसरे को सजाने में लगा देती है। बस शराब और सजने सजाने का ऐसा संगम हुआ कि वर को भी खफा होना पड़ा - दिखावे का ही। पर जब ये बाराती भांड नाचने लगते हैं, तो बस तन मन सब रम जाता है ' डांस ' में। पर इस बात कि कोई ' गारंटी ' नहीं कि दो घंटे के बाद किसे कहाँ ढूँढने जाना पड़ेगा। खैर इस बार भी बारात नाची और ख़ूब नाची। राकेश की इस विजय पर सारा मित्र समाज उन्हें बधाईयाँ देता है एवं उनके कुशल वैवाहिक जीवन की कामना करता है।
लेखक - अमेरिका से एक भांड, जो केवल मन से ही इस शादी में शामिल हो सका।
पुनःश्च : दोस्तों, ये लेखन अब जारी रहेगा। कुछ भी, कैसा भी।