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बुधवार, 27 नवंबर 2013

इतिहास का एक छोटा सा प्रश्न


छः मंजिल चढ़कर पुस्तकालय की, पहुँचा इतिहास खोजने
वह इतिहास जो पहले से ही पता था वहाँ मिलेगा ही नहीं
इतिहास तो छिपा है हिमालय में, और शायद डूबी हुई द्वारिका में
गंगा और उसकी उपनदियों के पानी में, शायद दक्खन के पठार में
 
न जाने क्यों जानते हुए भी ये प्रश्नवाचक प्रयत्न किया
क्या इतिहास मिलेगा यहाँ भी  
इस विशाल ओंटारियो झील में और इन ऊंची इमारतों की नीव में?
 
शायद २१०० तक यह प्रश्न, प्रश्न ही न रहे |
 
- नीरज मठपाल 
नवम्बर २७, २०१३ 

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

कुछ पल कोठी के साथ

(अंग्रेजो के समय की बनी एक कोठी को समर्पित, जो बचपन और किशोरावस्था के कई चित्रों को आज भी रंग भर देती है)  

आज एक बहुत अरसे बाद उस बड़ी कोठी में होकर आया 
सौ साल पुराने देवदारु के सामने खड़ी उस पुरानी इमारत को निहार कर आया 
उन बड़ी घुमावदार सीढियों पे छलांगे मारते हुए एक बार फिर खुद को पाया 
धूल की मोटी परत से सनी लम्बी आरामकुर्सी पे खुद को लम्बा होते पाया

जिस कोठी में कभी कहकहे गूंजा करते थे 
आज कह पाना मुश्किल था कि यह उसकी नितांत शांति थी या घुप्प अँधेरा 
जो मन को ऐसे अशांत कर रहा था 
जैसे कहकहों और ठठाकों को ठंडी हवाएं उड़ा ले गयी हों 

भूतहा पिक्चरों में अक्सर दिखते हैं 
ऐसी ही कोठियाँ और ऐसे ही उपस्कर (फर्नीचर)
पर नहीं दिखता उनमें वो जीवन अमृत 
जो शायद अब भी इन मजबूत लकड़ियों में बंद पड़ा है 

कोठी के भाड़ से ऐसी आवाज रुक रुक के आ रही है जैसे 
तीन चार भूत कुछ लड़ते हो, फिर कुछ इंतेज़ार करते हों प्रतिक्रिया का 
धड़कन थोड़ी तेज जरूर चल रही थी पर बीता समय गवाह था 
ये भूत नहीं लंगूरों की कोई तो प्रतियोगिता थी मालिकाना हक जताने की 

कोठी के बायीं तरफ की बालकनी में डगमग डगमग दो कदम सावधानी से रखे 
फिर तिलंगे की शीशेदार विस्तृत खिड़कियों से बाहर के पूरे दृश्य को आँखों में समाया 
कोठी के कुछ कमरों को ठकठकाने का अवसर बीच बीच में मिलता रहा 
लेकिन उन बड़ी अलमारियों में छिपने का निराला अनुभव बस सोच ही पाया 

आज फिर उसके आंगन में थोड़ी देर बैडमिंटन खेल आया 
दरवाजे के एक टूटे शीशे को बॉल से थोड़ा सा और तोड़ आया 
ऐसे ही अचानक हुए इस दौरे में कई यादें जी आया 
फिर से उस देवदारू के पेड़ की छाँवतले बैठ उस धूसर हरे रंग को निहार आया 

और कह आया उस कोठी / बंगले से - तुम यादों में हरे ही रहोगे। 


- नीरज मठपाल 
नवम्बर १२, २०१३ 

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

पूछोगे तो उत्तर मिलेगा क्या?


कवि -
 
कोई जन्मा तो कोई मरण की गोद में समाया 
कोई जवानी की शरण में बढ़ा तो कोई बुढ़ापे की 
ये चक्र क्या है जन्म मरण का 
इस भूलभुलैया को कोई क्या  सुलझा पाया 
 
मरण -
 
ये क्या हो रहा है ये क्यों हो रहा है 
क्यों लोग रो रहे हैं क्यों लोग दुखी हैं 
जब शरीर छोड़ते जीव ने आस पास देखा 
तो कुछ भी पूछ ना पाया 
 
बुढ़ापा -

खाना चबाना थोड़ा मुश्किल होने लगा
चार सीढ़ियां चढ़ना थोड़ा मुश्किल होने लगा
जब बुढ़ापे ने जवानी की तरफ देखा
तो इस अंतर का कारण पूछने लगा

जवानी -
 
समय का अभाव मुंडी हिलाने लगा 
एकाग्रता की स्याही सूखने लगी 
जब जवानी ने बचपन की तरफ देखा 
तो इस अंतर का कारण पूछने लगी 
 
बचपन -
 
खेलते खेलते थकान का नाम ना आया 
गहरी नींद में सपने का भान ना आया 
जब बचपन ने बुढ़ापे की तरफ देखा 
तो इस अंतर का कारण पूछने लगा 
 
जन्म -

ये क्या हो रहा है ये क्यों हो रहा है
क्यों लोग हंस रहे हैं क्यों लोग खुश हैं
जब जन्मे बच्चे ने आस पास देखा
तो कुछ भी पूछ ना पाया

- नीरज मठपाल 
जुलाई २५, २०१३ 


कविता और मन

आज बड़े दिन बाद कविता ने ठक ठक की दरवाजे पर
बोली कि एक नई कविता कहने का मन है
जिद थी कि खुद की लिखी कविता कहने का मन है

पहला शब्द दिमाग में आना ही जब दूभर हुआ
तो अहसास हुआ कि यह लम्बी निद्रा में सोया मन है
सांसारिक जीवन में एक अरसे से खोया ये व्यस्त मन है

ना इतिहास काम आया ना ही भूगोल
गणित ने विज्ञान को धता बताकर सिद्ध किया असीमित ये मन है
जब इबारत लिखी दर्शन शास्त्र ने समझा कि झूठा ये मन है

मन के झूठेपन की बात सुन कविता चुपचाप चलती बनी
उसकी आँखों से लगा कि एक अनकही जिद सुनाकर जाने का मन है
जिद है कि जब कहो सच्चे मन से कविता तभी आने का मन है

उसका ठक से आना चुपचाप चले जाना फिर भी चलता रहा
सच झूठ के बीच मन का कवि भी यूँ ही झूलता रहा


- नीरज मठपाल
जुलाई २५, २०१३

शनिवार, 19 मई 2012

उसकी बात

बैठे हुए उस तिपहिया वाहन में 
उसने मुझे अकेला पाकर 
कह दी अपने दिल की बात 
जैसे उसके मन में कई दिन से छिपी हो वो बात 
जैसे मन को हल्का करने को निकलनी जरूरी हो वो बात 

हमें पता था कि वो उसे चाहता है 
उसे भी पता था कि वो उसे चाहता है 
हमारे दोस्तों को भी पता था वो उसे चाहता है 
पर प्रश्न यही कि वो उसे क्यों चाहता है 
उसे भी पता था कि यही प्रश्न है 

उसे उत्तर तो पता था लेकिन हमें नहीं 
बैठे हुए उस तिपहिया वाहन में 
उसने मुझे अकेला पाकर 
कह दी उस उत्तर की बात 
कह दी अपने दिल की बात 

जब भीड़ में हो तो आपकी 
संवेदनाएं भी लुप्तप्राय हो जाती हैं 
जब अकेले हों तो आपकी 
संवेदनाएं उभर कर सामने आती हैं 
शायद तभी मैंने थोड़ा समझ ली उसके दिल की बात 

कुछ महीने बाद पता चला 
सबने समझी उसके दिल की बात 
किसी ने बैठे हुए किसी 'रेस्टोरेंट' में 
तो किसी ने रसोई के छोटे कोने में 
समझी उसके धड़कते दिल की बात 

बैठे हुए एक दूसरे चौपहिया वाहन में 
उन्होंने मुझे अकेला पाकर 
जब अनकहे ही कह दी अपने दिल की बात 
तभी मैंने पूरी तरह समझी 
उसके धड़कते दिल की बात 

- नीरज मठपाल 
मई 18, 2012


मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

अपन लोग

अंग्रेजों को अंग्रेजों का नाम देते देते ये जान लिया
आत्मीय भले ही वो न हों
लेकिन शिष्टाचार उनमें ज्यादा है
माला भले ही हम पहनाएं
पर इज्जत से बात करने का तरीका उनमें ज्यादा है

क्यों है जो हम पूरब पश्चिम का नारा लगते हैं
क्यों नहीं हम पूरब पश्चिम का फरक मिटा देते हैं
क्या है पूरब क्या है पश्चिम
क्या है उत्तर क्या है दक्षिण
पूरी भारत माता अपनी है
पूरी पृथ्वी अपनी है

सूरज अपना, चंदा अपना, तारे अपने
फिर क्यों नहीं तुम सब अपने
काश ये 'पराये' शब्द ही नहीं बना होता
काश कि प्यार का नया मतलब ही अपना होता
और वही सर्वभाव होता

सपना तो यहीं देखता है मन कि
सब कुछ ही अपना होता

- नीरज मठपाल
अप्रैल १७, २०१२

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

ये अक्षत हैवानियत कब तक?

वो एक अन्जानिस्तान की रात थी
चन्द्रमा डोल रहा था दांये बांये 
आकाश की कालविनाशक चादर ओढ़े 
औंधे मुंह लटक रहा था त्रिशंकु सा

चेहरे में सूरज तप रहा था
बांयी आँख के नीचे नीला हाथी
पास में पड़े दो चार टूटे तारे
एकदम लाल रंग में टिमटिमा रहे थे

सागर का सारा नमक चेहरे पर था
धरती का सारा मैलापन बरस रहा था
हैवानियत का अट्टहास था दांये बांये
वो एक दर्दिस्तान की रात थी

- नीरज मठपाल
फरवरी ८, २०१२

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

एक पति - अपनी पत्नी के प्रति

कभी कहती हो तुम हो 'परफैक्ट'
कभी कहती हो तुम में हैं कई 'डिफैक्ट'

कभी कहती हो तुम ही बने मेरे लिए
कभी कहती हो कैसे तुम पल्ले बंध गए

कभी कहती हो पैसा कम कमाते हो
कभी कहती हो पैसा क्यों लुटाते हो

कभी कहती हो जीना मरना साथ साथ
कभी कहती हो दूर रखो मेरे हाथों से अपना हाथ

कभी फ़ोन पर घंटो बातें करती हो
कभी फोन को सर पर पटक देती हो

कभी कहती हो मेरी जान हो तुम
कभी कहती हो बुरी आदतों की खान हो तुम

कुछ भी तुम कहती हो, पर प्यार तो बहुत करती हो
मुंह से भले ही न बोलो, मन में तो मुझे हरदम रखती हो

तुम कभी हंसकर बोलती हो, तो बहारें आ जाती हैं
तुम कभी गुस्सा होती हो, तो रातें डूब जाती हैं

मैं क्यों गुस्सा होऊँ इस बहती जिन्दगी की मुस्कान से
इसी मुस्कान से मुझे तुम मिली हो, तुम्हें मैं मिला हूँ

तुम भी क्यों गुस्सा होते हो इस जिन्दगी के रास्तों से
जब हमसफ़र साथ है तो रास्ते भी खुशी से साथ दे जायेंगे

फिर चाहे मुझ में हो कितने भी 'डिफैक्ट'
और जिन्दगी चाहे जितनी भी हो 'इम्परफैक्ट'

- नीरज मठपाल
सितम्बर ६, २०११

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

हिमांशु के प्रति

कोहरे के पीछे सरकती आकृतियाँ
उन घुमावदार मोड़ों पर खतरे का निशान थी
लेकिन दिन के घंटे ही आठ थे
उस पर वो २० किलोमीटर प्रति घंटा की गति

उन चंद गोल घूमते पैरों पर
कम से कम ४६ लोगों की जान का जिम्मा
वो पतली प्राणहीन सड़कें
पता नहीं कैसे उन कनखजूरों को थामे रखती थी

एक खबर पढ़ी थी कि ऐसे ही
३० लोग घाट कि खाई के हवाले हो गए
कुछ ऐसे ही गोल घूमते पैर
मुश्किल समय में भरी आँखों से दगा दे गए

जैसे कोहरे में डूबी वो सड़कें
यातायात का माध्यम नहीं
मौत की सफ़ेद - भूरी सजावट हो
गोल घुमते पैरों को जैसे
यमदूत की चुपचाप साथ दौड़ती आहट हो

एक दोस्त हमने भी बचपन में ऐसे ही खोया है
उन्हीं सड़कों के गोल घूमते पैरों में
वो आज भी हँसते हुए ही सोया है

- नीरज मठपाल
जुलाई १२, २०११

शनिवार, 25 सितंबर 2010

बर्तन सब साफ़ हैं

गले से लटकती हुई प्यासें
पेट से लटकती हुई भूखें

दरवाजे पर यूँ चलकर आती हुई भिन्डीयाँ
घी चुपड़ी पास बुलाती रोटीयाँ
थाली पर फैलती हुई दालें
कुकर के ढक्कन पर दस्तक देती चावलें

सब कुछ पलक झपकते गायब हो गया

रह गयी गले से लटकती हुई प्यासें
और अब भी पेट से लटकती हुई भूखें

- नीरज मठपाल
सितम्बर २५, २०१०

शनिवार, 11 सितंबर 2010

मेरा हृदय अब भी पहाड़ में बसता है

कदमों को विकास भी दिखा
नयनों को समंदर भी,
मन को साथी भी मिला,
समय को राह भी।

कुछ दूर भी हुआ
तो कुछ पास आया भी,
कुछ अलग वक्त को भी देखा
तो कुछ अलग वक्त ने दिखलाया भी।

कुछ अलग खुद को भी समझा
तो कुछ अलग खुद को समझाया भी,
आगे पीछे दिन रात भागते भी रहे
और रात दिन थमते रहे भी।

सोचा तो जाना भी
मेरा हृदय
अब भी पहाड़ में बसता है।

- नीरज मठपाल
सितम्बर ११, २०१०

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

काला सफ़ेद

देखा कि बाहर से झाँकते हुए
लम्बी कार के काले शीशों के
पीछे की दुनिया
कितनी सफ़ेद है।

लम्बाई की आड़ में
पहुँचने वाले काले गट्टों ने
सफ़ेद साये से पूछा,
दिखने के इस अंदाज को
सीखने से
क्यों हरवाना चाहता है।

सीखने ने दिखने से
नजर मिलाने को
इन्कार कर दिया और बोला,
देख, देख के बहुत सीख लिया
अब सीख, सीख के देख।

सफ़ेद शीशों के पीछे की
काली दुनिया को सीख
सफ़ेद गट्टों को काले साये
पहचान आने लगे।

- नीरज मठपाल
अगस्त ३१, २०१०

रविवार, 29 अगस्त 2010

फफूँदी

घर के किसी कोने में
दरी पर यूँ ही पड़ी
एक प्लेट ने उससे पूछा,
मैं तीन महीनों से उल्टी गिरी हूँ
फफूँदी का मैं अब घर बन चुकी हूँ
मुझे कब स्वच्छ पानी का
अमृत प्राप्त होगा?

फफूँदी हँसने लगी।

उसने चेहरे को प्लेट से
और दूर ले जाकर बुदबुदाया,
तू अकेली तो नहीं
सारे घर में सीलन है
उसी का पानी निचोड़
सब फफूँदी बन रहा है,
तू भी बन।

देखें पंचतत्त्व और ठोस पदार्थ में
भंगुरता किसे पहले दिखती है।
उसके मालिक ने कहा
घर को आग लगा दो !

लग गई आग।

इधर फफूँदी दूर किसी घर में
फिर हँस रही थी।

- नीरज मठपाल
अगस्त २९, २०१०

मंगलवार, 25 मई 2010

भट भट भट भट्टाम

ए बड़ी सी मेज
महोगनी की
विशाल घिसी हुई भुजा सी।
तेरा अंत निकट है
आगे के पाए उखाँडू पहले
या पीछे के
या दे मारूं
एक बड़ा हथौड़ा बीच में।
अजीब समस्या
प्राण हर लेने में भी
सोचना
कि आरम्भ कैसे हो।
सामान्य सी दर्शित होती मेज की
मौत ऐसी जटिल।
तो क्यों
जटिल मनुष्य को मिलती
इतनी सामान्य मौत।
बस कुछ ही आवाजें
ठांय ठांय ठांय और
भट भट भट भट्टाम।

- नीरज मठपाल
मई २५, २०१०

रविवार, 23 मई 2010

रात का उल्लू

ए उल्लू !
कहाँ जा रहा है?
बैठ अभी
रात के जाने में चार घंटे बाकी हैं
सुबह की काफी पीकर निकल जाना
दूर जाने का समय न भी मिले तो
पास के बड़े पत्तों से घिरे पेड़ पर ही
डेरा जमा लेना
दो - चार दिन।

माना वहाँ जगह कम है,
हजार उल्लू पहले से ही रात - दिन
उसी पेड़ पर लटके हैं।
और तू रात को विचरण करने वाले
चंद उल्लुओं में से एक बचा है।

माना कि तू उल्लुओं की
इस भीड़ में
अभी अल्पसंख्यक हो गया है।
माना कि तुझे बिना शुल्क
उस पेड़ पर कोई
दिन नहीं बिताने देगा।

फिर भी हे उल्लू !
तू दिन को यहाँ तो रह नहीं सकता।
उस पेड़ के उल्लू जैसे भी हैं,
हैं तो तेरे अपने।
तेरी जैसी ही बड़ी आँखें,
तेरे जैसे ही पंख।

तुझे वो एक दिन का मुसाफिर मान
मना न करेंगे।
मैं तेरे लिए एक
सिफारशी पत्र
लिख देता हूँ।

ये कोई आम पत्र नहीं,
तेरा प्रवेश पत्र है।
इसका मिलना तो
जैसे बड़ी तपस्या के बाद
अमृत का मिलना।

पर तू मेरा ख़ास उल्लू है,
तुझे बता ही दूँ
इस तपस्या का नाम -
अकडम बकडम छू
'जुगाड़' ।

मेरे सब दुखों के साथी,
तू जा,
ले जा,
मेरी इस तप पूँजी को।

इसी जुगाड़ मंत्र को
घोल ले कानों में और अब
जा भी,
उड़ जा।

- नीरज मठपाल
मई २२, २०१०

बुधवार, 12 नवंबर 2008

अंक, तेरी जय

अभी देखता हूँ मैं अपने सेलफोन को
जिस पर ० से लेकर ९ तक के अंक अंकित हैं
कुछ अंकों का ये खेल कितना महान है
इन कुछ अंकों ने पुरा काल से
पूरी दुनिया को चला रखा है

बचपन से लेकर आज तक
हर जगह यही अंक पहचान बनते आए
कभी अनुक्रमांक के नाम से तो
कभी इम्प्लौयी क्रमांक के नाम से

घर का पता भी अंक से
लापता हूँगा तो वो भी अंक से
मिलूँगा तो वो भी अंक से
आगे बदूँगा या पीछे हटूंगा तो वो भी अंक से

सोचो अगर अंक नहीं होते तो क्या होता
रूपयों और डॉलरों का ये व्यापर कैसा होता
विज्ञान का गणित
विज्ञान की मधुशाला न बन जाता
पर मधुशाला में भी तो अंक है

कितना ही सोच लूँ
कौन सी चीज है जिसे अंक की जरुरत नहीं
पर सोच ही जवाब दे गयी
बिना अंक का कुछ भी न मिल पाया

हे अंक, आज तू फ़िर से जीत गया
अंको के इस मुकाबले में
मैं फ़िर नौ - शून्य से मात खा गया

- नीरज मठपाल
नवम्बर १२, २००८

जाड़े का ये मौसम

कभी टिन की छत पर पड़ती
बारिश की बूंदों को क्या तुमने देखा है
कभी रजाई के अन्दर मुँह डालकर
क्या तुमने उन बूंदों का संगीत सुना है

क्या कभी तुमने निवाड़ वाली
चारपाई पर बैठकर
मित्र मंडली के साथ
गुड़ और मूंगफली का स्वाद चखा है

क्या कभी गिरती बर्फ को
कटोरे में रखकर तुमने उसे गुड़ के साथ खाया है
क्या कभी बर्फ पर पड़े पाले पर
तुमने फिसलने का भय महसूस किया है

क्या कभी ठिठुराने वाली ठंड में
तुमने आग की आंच महसूस की है
क्या कभी भुने हुए भुट्टे को
नीम्बू मिर्च लगाकर खाया है

क्या कभी बिजली चले जाने पर
रात भर हाथ पाँव मोड़कर नींद गुजारी है
क्या कभी सुबह जलते कोयलों पे
पानी गरम करके नहाया है

हर साल जाड़े का ये मौसम
इन्हीं सब पलों की यादें लेकर आता है
ददा ने सच ही लिखा था कभी
यादें ढकती हैं, यादें मिटती नहीं

- नीरज मठपाल
नवम्बर १२, २००८

रविवार, 12 अक्टूबर 2008

तलाश

अरे ओ एकांत
किस तरफ तू स्वप्न मग्न है?
देख पत्थरों के बीच भी
शांत संगीत में
किसे तेरी तलाश है।

अरे ओ मौन
किस तरफ तू छिप रहा है?
देख दिन की ओर भी
दिनकर की रोशनी में
किसे तेरी तलाश है।

निरीक्षण के ओ पैमानों
क्यों तुम्हारा प्रणयगीत मंद है?
देखो मिट्टी की ओर भी
ध्वनि प्रदूषण के हाहाकार में
किसे तुम्हारी तलाश है।

त्रिकोण के चार कोण
अब पंचभुज रच रहे हैं।
देखो यह बहुभुज निर्माण भी
सीमित कोणों की परमशक्ति में
त्रिभुज केंद्र को तुम्हारी तलाश है।

- नीरज मठपाल
अक्टूबर ११, २००८

सोमवार, 14 अप्रैल 2008

घास

विटप ऊँचे दृष्टित होते रहे
सन्निकट ही झाड़ सी फैलती घास
अदृश्य मौन रंजना सी

इसलिए क्या कि वो अपने आप ही उग आयी
और अपने कद को ऊँचा भी न कर सकी
इसलिए क्या कि उसका हरा रंग क्षणिक है
और जैसे मटमैली हो जाना उसकी नियति

जल प्रकाश का ऐसा अभाव
क्यों ये दुर्दैव
कि योग्यतम की उत्तरजीविता का डार्विनवाद
उसी पर लागू हो

रचने की मीमांसा का अर्थ समझा
एक तिनका सहेज कर उस घास से
अब वो तिनका भी प्रवाहित हो गया
प्राण वायु के वेग में

इस व्याकुलता में कोई कौतुहल नहीं
अब जड़ भी तो जंगम नहीं
अंतर्नाद में अंतर्द्वन्द्व
घास की यह तो परिभाषा नहीं

- नीरज मठपाल
अप्रैल १४, २००८

गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

रंग

सामने का वह हरा चीड़ का पेड़
रानीखेत का जंगल दिखाता है।
देवदारू का झुरमुट
आल्मा हाउस का वृक्ष नजर आता है,
आपनी छाया में जैसे
मुझी को समेट लेना चाहता है पागल।

सूरज झाँक रहा है
उस मकान की तिरछी छत से
उसके ओज को निहारूं
तो हिमालय पर उसकी पड़ती किरणें
अपने आगोश में लेती हैं।

छोटे से पौधे को देखूं तो
बच्चों की किलकारी सुनाई पड़ती है,
लाल रंग के पत्तों में
गेरू से लीपी ड्योढी नजर आती है।
मन के कागज पर जैसे
उसके सफ़ेद एपण एक चित्र खींचते हों।

आगे बढूँ तो वो पीला फूल
स्वेटर पर एक पीला रूमाल लगा देता है।
लाल रंग की ईजा की बुनी हुई टोपी
ख़ुद ही सिर पर बैठती है,
मैं फ़िर से चौथी कक्षा में पहुँच जाता हूँ।

अपने बस्ते को पीठ पर लगाकर
मस्ती में गुनगुनाता हूँ -
" संगठन गढे चलो, सुपंथ पर बढे चलो
भला हो जिसमें देश का, वो काम सब किए चलो"

चलते चलते पत्थर पर ठोकर मारूं
तो धप की आवाज
पिड्डू की याद दिलाती है।
गोधूली की यह बेला
सन् छियासी की सफ़ेद गाय का दूध पिलाती है,
धीरे धीरे काला होता यह आकाश
शान्ति द्वार में प्रविष्ट कराता है।

घड़ी की सुईयां जैसे
उल्टी चल रही हों
बताने के लिए कि कोई रंग नहीं बदला
इन्द्रधनुष आज भी सतरंगी है।
तेरे मन की फुलवारी
आज भी बहुरंगी है।

फ़िर स्वयं ही रोकता हूँ
घड़ी के इन काँटों को,
कि काँटों!
सतत बहना ही
तुम्हारा है कर्म।
रंगों को मन में बसाकर
और रंग फैलाना ही है
जीवन का मर्म।

मन है
रंगों से सरोबार इस दुनिया की
हवाओं में मैं हवा हो जाऊं।
कुछ रंगों की सुनूँ,
कुछ रंगों की सुनाऊँ।

हाथ में फ़िर पैंसिल है
उकेर दूँ कुछ और अक्षरों को
अक्षरों की दुनिया भी तो बहुरंगी है।

हरित स्यामल रंग को
उज्जवल मन में बसाते रहिये,
रंग बिरंगे इस जीवन को
और रंगीन बनाते रहिये।

- नीरज मठपाल
अप्रैल १०, २००८