Saturday, August 22, 2009

ताम्रपत्र

कई दिनों से एक बस को जाते हुए देख रहा हूँ मैदानी और पहाडी सडकों में कभी सीधे भागते हुए, तो कभी मोडों को हार्न की आवाज के साथ पार करते हुए। मन चाह रहा है कि बस से मैं भी बाहर देखूं पेड़ों को भागते हुए, घास को रंग बदलते हुए, सूरज को रोशनी मंद करते हुए।

इसी सब में आठ - नौ महीने निकल गए और मेरी सोच और लेखनी दोनों ही किसी दूर द्वीप में जाकर सो से गए। अभी मैं ख़ुद ही भटकते हुए बिना जहाज के पता नहीं कैसे इस द्वीप में जा पहुँचा। कुछ तो अलग सी ही सुनसानियत है यहाँ पर, कोई आहट भी नहीं, ना ही कोई परिंदा, ना पेड़। बस समुन्दर के बीच में लाल मिट्टी से बना एक ऊंचा नीचा पहाड़, जैसे समुद्र से किसी ने जबरदस्ती बाहर खींच निकाला हो उसे।

शायद वीरान जगह कहलाने के लिए ये बिल्कुल उचित द्वीप होता, अगर मेरी नजर जमीन पर गिरे एक बड़े से काले कपड़े पर नहीं पड़ती। भागा भागा पहुँचा मैं उस तक, बिल्कुल एक रुमाल की तरह पड़ा हुआ था, जिसमें सफ़ेद अक्षरों में लिखा हुआ था - " बंजर ख्यालों का भरा प्याला, जो प्रजा और राजा सबको मुक्ति देगा"

मैं इन शब्दों में कुछ खोजने का प्रयत्न कर ही रहा था, कि अचानक से उस कपड़े का रंग बदलकर नीला होने लगा और अक्षरों का काला। जैसे जैसे सूरज सर के ऊपर चड़ता गया, रंग बदलते गए। इस पहेली और पिछले तीन दिन की भूख प्यास से थका हुआ शरीर कब नींद के आगोश में समा गया, पता ही नहीं लगा। जब आँख खुली तो देखा आकाश में छोटे छोटे तारे टिमटिमा रहे थे, चाँद का कहीं कोई नामो - निशाँ ही नहीं था। अंदाजा लगाया कि जरूर अमावस्या रही होगी। शायद तारे टिमटिमा कर यह अहसास दिला रहे थे कि धरती के किसी भाग पर आज दिवाली मन रही होगी।

रात बड़ने के साथ ठंड भी बड़ने लगी थी। मैं यूँ ही प्राणरहित सा गोल मोल होकर पड़ा रहा उस कपड़े से अपने सिर को ढकने का प्रयास करता हुआ सा। जब अगली सुबह देखने की आशाएं धूमिल सी होने लगी, तभी कान में जोर जोर से तलवारों के टकराने की आवाज सुनायी देने लगी। मन में आशा जागी कि काश ये आवाज मेरे सैल फ़ोन की किसी रिंग टोन की करामत हो। लेकिन मन अभागे को कहाँ पता था कि ये तो दुनिया ही कोई दूसरी थी, समय ही कोई दूसरा।

किस दुनिया मैं पहुँच गया था मैं और कौन सा समय था ये? क्या मैं ये जानने में सफल हूँगा? क्या मुझे द्वीप में इतिहास की कुछ अनकही, अनसुनी परतों से धूल हटाने का मौका मिलेगा? या फ़िर मैं ...?

* * * * * * * * * *

शीर द्वीप सभ्यता; १२४२० ईसवी पूर्व। शीराष्ट्र देश।


यह वही जगह है जहाँ आज अरब सागर भारतवर्ष के पश्चिमी किनारों पर दस्तक देता रहता है। पर एक समय वहाँ पर जल के नाम पर केवल एक विशाल नदी बहा करती थी - "देवंत्रित" नदी। नदी भी ऐसी कि उससे दस छोटी धाराएँ निकलकर शीराष्ट्र के सभी महत्तवपूर्ण स्थानों को पेयजल प्रदान करती थी। किवदंती यह थी कि जिस भी जगह हजार भले लोग रहते होंगे, शीर नदी स्वयमेव उस स्थान के लिए एक धारा को मोड़ देगी। कई युगों से यह देश संपूर्ण विश्व का राजनीतिक एवं आर्थिक केन्द्र था। इस देश के ऐतिहासिक ताम्रपत्रों और भोजपत्रों से पता चलता था कि लगभग ४८००० ईसवी पूर्व मानव का अभ्युदय हुआ था, जो कि एक नयी शुरुआत भर थी। ऐसे ही कई युग पहले आकर जा चुके थे। सृष्टि का चक्र निरंतर गोल घूमता ही रहता था। एक चक्र ६४००० वर्ष चलता था, उसके बाद १२८००० वर्ष कि अबूझ शान्ति के बाद एक नए चक्र का आरम्भ होता था।

यदि चक्र का यह कथन सत्य है तो अभी मेरी सृष्टि के वास्तविक (माना कि ये २००९ ईसवी है) वर्ष के हिसाब से १३९९१ वर्ष और शेष हैं। अभी मैं इस बात से अनजान हूँ कि मैं कैसे देख पा रहा हूँ आज से १४००० वर्ष पूर्व का समय? क्या ये सर पर ढका हुआ रंग बदलता कपड़ा, कपड़ा नहीं बल्कि किसी ख़ास इतिहास का आईना है?

शीर वंश के राजा नृपदेव का दरबार। लगभग ३०० * ३०० फीट में फैला हुआ एक विशालकाय कक्ष, जो बीच बीच में हीरा पन्ना जडित विशालकाय स्वर्ण स्तंभों पर टिका हुआ था। हर स्तम्भ एक अलग युग की गाथा कहता था।

इससे आगे कि मैं कुछ जान पाता, मेरी एकाग्रचित्तता ने मेरे साथ और किसी सामान्य दिन की तरह ही मेरा साथ छोड़ दिया। समय में झाँकने की मेरी कोशिश अवश्य ही होगी; जैसे ही कुछ और परतें खुलती हैं, मैं उन्हें अंकित करता हूँ। तब तक ... ताम्रपत्र तो कहीं न कहीं जरूर है, खोज जारी रहे।

* * * * * * * * * *

मेरे हाथ काले कपड़े से बंधे हुए थे और होंठों पर कुछ खून जमा हुआ था, पूरा शरीर दर्द कर रहा था जैसे किसी ने मेरी जम कर पिटाई की हो। आँखे उठाकर ऊपर देखा तो पुलिसिया वर्दी में एक मोटे से इंसान को चाय पीते देखा। उसने आवाज दी, "क्यों रे छोकरे, जबान खोलेगा कि नहीं अब, या और पिटेगा? सहारनपुर पुलिस को मजाक समझ के रखा है तूने? १३ मर्डर करके बचके निकल जाएगा सोचा था तूने?"

मैं बुदबुदाया, "बंजर ख्यालों का भरा प्याला, जो प्रजा और राजा सबको मुक्ति देगा"

* * * * * * * * * *

अटलांटिक महासागर संयुक्त राज्य अमेरिका के सुदूर दक्षिणी तट पर लहरों के खेल में मगन था - इस बात से बेखबर कि एक पनडुब्बी १३ मृत इंसानों को ढोते हुए "की वेस्ट" की तरफ़ बढ़ रही है। अपनी मौलिक सुन्दरता के लिए विख्यात ये जगह आज कुछ ज्यादा ही व्यस्त लग रही थी। बीच किनारे हजारों की संख्या में बैठे लोग "सन बाथ" का आनंद ले रहे थे। एक हिन्दुस्तानी समूह, जिसमें ४ आदमी, ४ औरतें और ५ बच्चे रहे होंगे, पुराने हिन्दी गीत लगाए हुए खाने पीने में व्यस्त था; बच्चे एक दूसरे के पीछे भाग रहे थे, कभी कोई रेत में गिर जाता, तो बाकी के सारे बच्चे उस पर आ गिरते।

आलू पूरी की सुगंध मेरे मुहँ में बार बार पानी ला रहा थी, मन हुआ कि जाकर दो पूरी मांग ही लूँ। जब सुगंध असहनीय हो चली, तो मैं जा पहुँचा उनके पास। बात करने से पता लगा कि वो लोग मूलतः बुंदेलखंड से थे और लगभग ६४ वर्ष पूर्व अमेरिका आकर बस गए थे। सीडी प्लेयरमें आनंद का गाना बज रहा था, "जिंदगी कैसी है पहेली हाये, कभी ये रुलाये कभी ये हंसाये" । मुझे भी मन हुआ कि काश मेरे पास खूब सारे गुब्बारे होते अभी और मैं बच्चों में बांटता। ये विचार तब गायब हुआ जब पीछे से आकर एक बच्चे ने आके मेरा हाथ पकड़ा और बोला अंकल आपको कोई कहानी आती है?

दिमाग में वही कहानी टकराई, "बंजर ख्यालों... "

* * * * * * * * * *

क्रमशः...

- २२ अगस्त, २००९

Friday, November 21, 2008

एक आम कार्यालय

गहरे नीले रंग की टिन की चादरें,
चारों ओर दूधिया रोशनी बिखेरती,
छत से लटकती लम्बी लम्बी ट्यूबलाइट्स,
सफ़ेद रंग से पुती निरंग दीवारें,
कमरे को विभाजित करते कुछ घनाकार खम्भे,
आसपास अपने ही जैसे अनजाने चेहरों के बीच
इसी चहारदिवारी में एक कर्मचारी बैठता है।

कुछ अनकहे अपूर्ण सपनों को लेकर,
कागजों या कम्पयूटर पर अपने हाथों को घिसते हुए,
चाय काफ़ी की चुस्कियों को गले में उतारकर
मस्तिष्क को प्रतिदिन प्रतिक्षण कुंद होते देखता है।
शरीर को विभाजित करती मांसपेशियों,
शिराओं और धमनियों में एक पराधीन खून तैरता देख
इसी को जीवन की नियति मानकर एक कर्मचारी यहीं बैठता है ।

- नीरज मठपाल
नवम्बर २१, २००८

एक आम कर्मचारी

एक कर्मचारी के घर से बाहर कदम चलते हैं,
कार्यालय के प्रवेश द्वार को सहसा देखते हैं,
देखते हैं कि आज भी वही रोजमर्रा का काम निपटाना है,
लकड़ी की उसी कुर्सी पर रोज की तरह जीवन का भोग लगाना है।

दिन ढलने पर वही कदम घर की तरफ़ बढ़ते हैं,
कार्यालय के प्रवेश द्वार को सहसा निकास मार्ग सा देखते हैं,
देखते हैं कि आज भी घर में खा पीकर बीवी बच्चों पर रौब जमाना है,
लकड़ी की उसी खाट पर रोज की तरह बिना सपनों की नींद लिये सो जाना है।

- नीरज मठपाल
नवम्बर २१, २००८

मिलन (२)

प्रथम को अग्रसर करता द्वितीय बिन्दु
हृदयपट पर अंकित होते चित्र
तन में घुलती मधुर स्मृतियाँ
नयनों में बसती ज्यामिती
कानों में बारम्बार दस्तक देती मिठास
कपाल पर झूलती अश्रुमिश्रित केशराशियाँ

ढलती गोधूलि के बीच
नयनों से झरते अश्रु
शांत होती जाती धड़कनें
हाथों में घबराहट का आभास देकर
पलकों को घिसती अंगुलियाँ
मिलन का ये अद्भुत द्वितीय बिन्दु

- नीरज मठपाल
नवम्बर २१, २००८