गुरुवार, 25 जुलाई 2013

पूछोगे तो उत्तर मिलेगा क्या?


कवि -
 
कोई जन्मा तो कोई मरण की गोद में समाया 
कोई जवानी की शरण में बढ़ा तो कोई बुढ़ापे की 
ये चक्र क्या है जन्म मरण का 
इस भूलभुलैया को कोई क्या  सुलझा पाया 
 
मरण -
 
ये क्या हो रहा है ये क्यों हो रहा है 
क्यों लोग रो रहे हैं क्यों लोग दुखी हैं 
जब शरीर छोड़ते जीव ने आस पास देखा 
तो कुछ भी पूछ ना पाया 
 
बुढ़ापा -

खाना चबाना थोड़ा मुश्किल होने लगा
चार सीढ़ियां चढ़ना थोड़ा मुश्किल होने लगा
जब बुढ़ापे ने जवानी की तरफ देखा
तो इस अंतर का कारण पूछने लगा

जवानी -
 
समय का अभाव मुंडी हिलाने लगा 
एकाग्रता की स्याही सूखने लगी 
जब जवानी ने बचपन की तरफ देखा 
तो इस अंतर का कारण पूछने लगी 
 
बचपन -
 
खेलते खेलते थकान का नाम ना आया 
गहरी नींद में सपने का भान ना आया 
जब बचपन ने बुढ़ापे की तरफ देखा 
तो इस अंतर का कारण पूछने लगा 
 
जन्म -

ये क्या हो रहा है ये क्यों हो रहा है
क्यों लोग हंस रहे हैं क्यों लोग खुश हैं
जब जन्मे बच्चे ने आस पास देखा
तो कुछ भी पूछ ना पाया

- नीरज मठपाल 
जुलाई २५, २०१३ 


कविता और मन

आज बड़े दिन बाद कविता ने ठक ठक की दरवाजे पर
बोली कि एक नई कविता कहने का मन है
जिद थी कि खुद की लिखी कविता कहने का मन है

पहला शब्द दिमाग में आना ही जब दूभर हुआ
तो अहसास हुआ कि यह लम्बी निद्रा में सोया मन है
सांसारिक जीवन में एक अरसे से खोया ये व्यस्त मन है

ना इतिहास काम आया ना ही भूगोल
गणित ने विज्ञान को धता बताकर सिद्ध किया असीमित ये मन है
जब इबारत लिखी दर्शन शास्त्र ने समझा कि झूठा ये मन है

मन के झूठेपन की बात सुन कविता चुपचाप चलती बनी
उसकी आँखों से लगा कि एक अनकही जिद सुनाकर जाने का मन है
जिद है कि जब कहो सच्चे मन से कविता तभी आने का मन है

उसका ठक से आना चुपचाप चले जाना फिर भी चलता रहा
सच झूठ के बीच मन का कवि भी यूँ ही झूलता रहा


- नीरज मठपाल
जुलाई २५, २०१३