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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

छ: मित्र

छोटे परदे पर सरपट भागते चित्रों के साथ
एक गोलाकार चार इंच व्यास की आकृति
और छ: घनिष्ठ मित्रों का अबाध साथ
कुछ पता नहीं कई शामें कैसे निकल गई
उनके पूरे के पूरे दशक को
कुछ पतली गोलाकृतियों में सिमटा पाया
लेकिन उनका असर कितने लाखों में आज भी होता होगा

गजब है, गजब है, गजब है
छ: घनिष्ठ मित्रों का साथ गजब है।

- नीरज मठपाल
फरवरी १७, २०११

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

दैनन्दिनी

३६५ पृष्ठों के हिसाब - किताब
१२ महीनों के सुख - दुःख
१ बरस की रचनात्मकता
को चबा - चबा के
खा गयी कुछ ' जीबी की मैमोरी '
और कुछ ' रेडीमेड छोटे बड़े डब्बे '

- नीरज मठपाल
अक्टूबर ७, २०१०

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

हस्ताक्षर

आपका पद आपका पैसा
बोलेगा
आपके हस्ताक्षर का मूल्य क्या है?
लेखक के हस्ताक्षर
कुछ बोलते नहीं ।

- नीरज मठपाल
अक्टूबर १, २०१०

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

फैसला

सिन्दूरी लाल दिवाकर
रंग केसरिया तिलक
हरित चित्र
टिमटिमाती चंद्ररात

भोर न हो
रक्तिम लाल
न हो
स्याह रात


- नीरज मठपाल
सितम्बर २८, २०१०

शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

एक आम कार्यालय

गहरे नीले रंग की टिन की चादरें,
चारों ओर दूधिया रोशनी बिखेरती,
छत से लटकती लम्बी लम्बी ट्यूबलाइट्स,
सफ़ेद रंग से पुती निरंग दीवारें,
कमरे को विभाजित करते कुछ घनाकार खम्भे,
आसपास अपने ही जैसे अनजाने चेहरों के बीच
इसी चहारदिवारी में एक कर्मचारी बैठता है।

कुछ अनकहे अपूर्ण सपनों को लेकर,
कागजों या कम्पयूटर पर अपने हाथों को घिसते हुए,
चाय काफ़ी की चुस्कियों को गले में उतारकर
मस्तिष्क को प्रतिदिन प्रतिक्षण कुंद होते देखता है।
शरीर को विभाजित करती मांसपेशियों,
शिराओं और धमनियों में एक पराधीन खून तैरता देख
इसी को जीवन की नियति मानकर एक कर्मचारी यहीं बैठता है ।

- नीरज मठपाल
नवम्बर २१, २००८

एक आम कर्मचारी

एक कर्मचारी के घर से बाहर कदम चलते हैं,
कार्यालय के प्रवेश द्वार को सहसा देखते हैं,
देखते हैं कि आज भी वही रोजमर्रा का काम निपटाना है,
लकड़ी की उसी कुर्सी पर रोज की तरह जीवन का भोग लगाना है।

दिन ढलने पर वही कदम घर की तरफ़ बढ़ते हैं,
कार्यालय के प्रवेश द्वार को सहसा निकास मार्ग सा देखते हैं,
देखते हैं कि आज भी घर में खा पीकर बीवी बच्चों पर रौब जमाना है,
लकड़ी की उसी खाट पर रोज की तरह बिना सपनों की नींद लिये सो जाना है।

- नीरज मठपाल
नवम्बर २१, २००८

मिलन (२)

प्रथम को अग्रसर करता द्वितीय बिन्दु
हृदयपट पर अंकित होते चित्र
तन में घुलती मधुर स्मृतियाँ
नयनों में बसती ज्यामिती
कानों में बारम्बार दस्तक देती मिठास
कपाल पर झूलती अश्रुमिश्रित केशराशियाँ

ढलती गोधूलि के बीच
नयनों से झरते अश्रु
शांत होती जाती धड़कनें
हाथों में घबराहट का आभास देकर
पलकों को घिसती अंगुलियाँ
मिलन का ये अद्भुत द्वितीय बिन्दु

- नीरज मठपाल
नवम्बर २१, २००८

बुधवार, 19 नवंबर 2008

मिलन (१)

अनसुनी आहट का ये प्रथम बिन्दु
सुपरिचित प्रिय के आगमन का आभास
क़दमों की मदमाती चाप
द्वार पर होती मीठी खट खट
हृदय गति को अनायास ही
जैसे त्वरण मिल गया हो

प्रीत से मिलने का संयोग श्रृंगार
चक्षुओं की अपलक व्यग्रता
नासिका में वायु की तीव्र होती ध्वनि
अधरों का मूक कम्पन
कंठ से लार का उदर में प्रवेश
मिलन का ये अनकहा प्रथम बिन्दु

- नीरज मठपाल
नवम्बर १९, २००८

रविवार, 12 अक्टूबर 2008

इंतजार के बीस मिनट

धैर्य का प्रारूप देखिये
जिसने दिनों को क्षणों में परिवर्तित कर दिया

अधैर्य का भी ब्यौरा दीजिये
जिसने कुछ क्षणों को पूरा जन्म बना दिया

धैर्य - अधैर्य का खेल है ही निराला
जिसने बढ़िया खेला, पर्वत को पानी बना दिया

प्रश्न है कि इंतजार के बीस मिनटों ने
लोहे को पिघलाकर वाष्प कैसे बना दिया?

- नीरज मठपाल
अक्टूबर १२, २००८

मंगलवार, 25 मार्च 2008

खुशी

खुशी की आवाज
जब छलकती हुई कानों पर पड़ती है,
खुशी का साज
जब हृदय के द्वार पर पहुँचता है,
मेरे होँठ स्वयं ही फ़ैल जाते हैं।
जैसे खुशी के स्वागत के लिए
मोतियों की माला यौवन चरम पे हो।
जैसे मेरी बाहें खुलने को आतुर हों
खुशी समेटकर उसे फैलाने के लिए।
इस आवाज का ये रूपहला अंदाज
मन में भीगा भीगा सा ये अहसास
बस यूँ ही गुदगुदा जाता है
पल कुछ और खुशियों के दे जाता है।

- नीरज मठपाल
मार्च २५, २००८

रविवार, 22 अप्रैल 2007

पत्र

मेरे कदम स्वतः प्रतिदिन
उस पत्रपेटी की तरफ बढ़ते हैं।
स्वतः ही आँखें उन कागजों में
मेरा नाम खोजने लगती हैं।
हाथ वहाँ कुछ न पाकर
स्वतः ही हृदय को वहीं रोक देता है।
धन्यवाद मेरी चिर साथी मस्तिष्क कोशिकाओं का
जो स्वतः ही सब सामान्य कर देती हैं।
अंतर्मन से जुड़े तार
स्वतः ही कभी न पहुँचने वाले
उस पत्र के भाव पढ़ लेते हैं।

... Nice body coordination :-)

- नीरज मठपाल
जनवरी २००५

सीमा

सुरक्षा का भाव देती
जालियों की घेराबंदी
सुरक्षा किससे
और किसलिये।
बचना उनसे जो
लोभ पिपासु होकर
दूसरों के दुःख में
अपनी ख़ुशी ढूँढते हैं।
आख़िर इस असीम क्षेत्र में
सीमाओं की
क्या सचमुच आवश्यकता थी?

- नीरज मठपाल
फरवरी २०, २००५

प्रीत

आगे बढ़ा चुके हैं कदम,
इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि अपनी प्रीत को कम कर दें हम।
इससे तो मैं प्रीत का नाम ही न लूँ।
भले खामोश हो जाये मेरी प्रीत।
जो रहे, वही प्रीत।

- नीरज मठपाल
जून ११, २००६

दीक्षा

अवरोध - प्रतिरोध सब दृश्य हो चला,
मन का प्रतिरोध अदृश्य हो चला,
मन का अवरोध क्षीण हो चला,
आत्म - अवरोध शून्य है
मस्तिष्क तब भी मौन है।
जाने किस अवरोध की प्रतीक्षा है,
क्या मन - आत्म - मस्तिष्क को
मिल रही ये कोई मूक दीक्षा है।

- नीरज मठपाल
जून ११, २००६