गुरुवार, 25 जुलाई 2013

कविता और मन

आज बड़े दिन बाद कविता ने ठक ठक की दरवाजे पर
बोली कि एक नई कविता कहने का मन है
जिद थी कि खुद की लिखी कविता कहने का मन है

पहला शब्द दिमाग में आना ही जब दूभर हुआ
तो अहसास हुआ कि यह लम्बी निद्रा में सोया मन है
सांसारिक जीवन में एक अरसे से खोया ये व्यस्त मन है

ना इतिहास काम आया ना ही भूगोल
गणित ने विज्ञान को धता बताकर सिद्ध किया असीमित ये मन है
जब इबारत लिखी दर्शन शास्त्र ने समझा कि झूठा ये मन है

मन के झूठेपन की बात सुन कविता चुपचाप चलती बनी
उसकी आँखों से लगा कि एक अनकही जिद सुनाकर जाने का मन है
जिद है कि जब कहो सच्चे मन से कविता तभी आने का मन है

उसका ठक से आना चुपचाप चले जाना फिर भी चलता रहा
सच झूठ के बीच मन का कवि भी यूँ ही झूलता रहा


- नीरज मठपाल
जुलाई २५, २०१३

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