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बुधवार, 26 जनवरी 2011

खबर २०१०

स्थान : भारत गणराज्य, वर्ष : २०१०, कुछ खबरें :

[प्रस्तुत आंकडे इंटरनेट स्रोतों जैसे गूगल, विकी से लिए गए हैं एवं असलियत से थोडा इधर उधर हो सकते हैं]

१) जनवरी २,१६,१७,२२ - कोहरे के कारण ६ रेल दुर्घटनाएं - लगभग १५ की मौत, ६० से ऊपर घायल
२) जनवरी ३० - आंध्र प्रदेश में नाव डूबी - लगभग १२ मरे, २० लापता
३) फरवरी ५ - कश्मीर में मुठभेड़ - १७ भारतीय जवान शहीद
४) फरवरी १३ - पुणे में आतंकी हमला, बम विस्फोट - १७ मरे, ६० से ऊपर घायल
५) फरवरी १५ - बंगाल में नक्सलियों का हमला - २४ जवान मरे गए, कई लापता
६) फरवरी १७ - जलाऊं जिले में बस दुर्घटना - २२ की मौत
७) मार्च ४ - प्रतापगढ़ में मंदिर में भगदड़ - ६४ मरे, कई घायल
८) मार्च - कोलकाता में भवन में आग लगी - २४ की मौत
९) अप्रैल ३ - माओवादियों ने उड़ीसा में बस उड़ाई - १० पुलिस वाले मरे
१०) अप्रैल ६ – दांतेवाड़ा में नक्सली हमला – ७० जवानों की मौत
११) अप्रैल १३ - बंगाल में तूफ़ान - १४० से ऊपर मरे, ५००००० से ऊपर प्रभावित
१२) मई ७ - कश्मीर में मुठभेड़ - ७ मरे
१३) मई ८ - छत्तीसगढ़ में नक्सली हमला - ७ सी आर पी एफ ऑफिसर मरे
१४) मई १६ - छतीसगढ़ में माओवादी हमला - ६ ग्रामीण मरे
१५) मई १७ - दांतेवाडा में बस में विस्फोट, नक्सली हाथ - ४४ विशेष पुलिस कर्मी मरे
१६) मई १९ - तमिलनाडु में साइक्लोन - १० मरे, कई प्रभावित
१७) मई २१ - मंगलौर में एयर इंडिया का विमान दुर्घटनाग्रस्त – १५८ की मौत
१८) मई २८ - मेदिनीपुर रेल विस्फोट - १५ कि मौत, १५० से ऊपर घायल
१९) जून २ – गर्मी / लू का उत्तरी भारत में आतंक - १०० से ऊपर मरे
२०) जून १७ - महाराष्ट्र में भारी वर्षा - ४६ मरे
२१) जून २५ - पटना में ट्रक - बस दुर्घटना - १७ मरे, २५ घायल
२२) जून २६ - कश्मीर में मुठभेड़ - ५ मरे
२३) जून २९ - छत्तीसगढ़ में माओवादी हमला - २६ पुलिस वाले मरे
२४) जुलाई १९ - रेल दुर्घटना - ५० की मौत
२५) अगस्त १ - कश्मीर में मुठभेड़ - ६ मरे
२६) अगस्त ६ - लेह में बाढ़ - ११३ मरे, कई प्रभावित
२७) अगस्त १८ - कपकोट, उत्तराखंड में विद्यालय भवन गिरा - १७ मरे
२८) सितम्बर २० - शिवपुरी, मध्य प्रदेश में रेल दुर्घटना - २१ मरे, कई घायल
२९) अक्टूबर १० - बक्सर, बिहार में नाव डूबी – ३६ मरे
३०) अक्टूबर ११ – बुलंदशहर में बस नदी में गिरी – १८ मरे
३१) अक्टूबर ३० - बंगाल में नाव डूबी - १६ मरे, ७० लापता
३२) नवंबर १ - बंगाल में नाव दुर्घटना - ७४ मरे
३३) नवंबर २ - गुजरात में ट्रक दुर्घटना - १७ मरे
३४) नवंबर १५ - दिल्ली में इमारत गिरी - ६६ से ऊपर मरे
३५) नवंबर २१ - औरंगाबाद, बिहार में माओवादी हमला - ७ मरे
३६) दिसंबर २६ – बदायूं में बस ट्रक दुर्घटना - ३४ मरे
पुनश्च: २०११ का आरम्भ ही देखिये -
३७) जनवरी २०११ – शबरीमला, केरला में मंदिर भगदड़ - १०० से ऊपर मरे, कई घायल
पिछले कई वर्षों से तकरीबन इसी तरह की खबरें साल की सुर्ख़ियों में रहती हैं। इसके अतिरिक्त भी कुछ घटनायें रही साल २०१० की जैसे कि कुछ और भ्रष्टाचार के किस्से, राष्ट्रकुल खेल, सचिन के कमाल, आदि आदि, लेकिन जब २०१० का अवलोकन किया, तो ये दिल को दुखाने वाला ‘पैटर्न' मिला -

१) यातायात संबंधी दुर्घटनाएं - बस, ट्रक, नाव, दुपहिया, कार, विमान
२) आतंकवाद - कश्मीर में वर्षों से चल रहा आतंक, नक्सली, माओवादी
३) मानवीय भूलें - भगदड़, भवनों का गिरना / जलना
४) प्रकृति का प्रकोप – बाढ़, गर्मी / सूखा, तूफ़ान, भूकंप, सूनामी

ये वही समस्याएं हैं, जिनका वर्षों से निदान पाने की कोशिश में कभी एक कदम आगे बढ़ाया जाता है, तो अगले ही क्षण दो कदम पीछे खींच लिए जाते हैं। शायद हमारे पास लड़ने के लिए सामर्थ्य से ज्यादा ही चीजें हो गयी हैं और सब कुछ नियंत्रण में लाना हर बीतते साल के साथ मुश्किल होता जा रहा है। हम सभी के पास जब भी समय हो, दोष देने के लिए बहुत कुछ है - भ्रष्टाचार, जनसंख्या, भुखमरी, कुपोषण, अशिक्षा और न जाने क्या क्या। पर शायद एक चीज कुछ पीछे छूट गयी है - जीवन की कीमत। ये खबरें तो कम से कम इसी तरफ इशारा करती हैं। खबरें आती रहती हैं आज इतने मरे, कल उतने मरे। हम एक अखबार में कोई भी ‘टाईमपास' खबर पढ़ने की तरह उसे पढ़ जाते हैं (वो भी जरूरी नहीं), शेष उसका कुछ अर्थ नहीं। सरकार प्रयत्नशील है कि कुछ ख़बरें तो कम की जाएँ, लेकिन उन्हें भी नहीं पता कितनी खबरें कितनी नयी दिशाओं से आने का इंतज़ार कर रही हैं।

मौत का ये अट्टाहास कभी कान से हल्की हवा सा गुजर जाता है, कभी बिलकुल समीप से गुजरती रेल की तरह धड़धड़ाहट करता दिल दहला देता है। क्या हम कभी जीवन की कीमत समझेंगे?

- नीरज मठपाल
जनवरी २६, २०११

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

समुद्र से उगता सूरज

अभी दो सप्ताह ही तो हुए जब शनिवार के दिन हमने तय किया कि कल सुबह सुबह सूर्य दर्शन पर निकला जाए। सबसे जरूरी था मौसम का हाल जानना क्योंकि पिछले दो बार सुबह सुबह सूर्य दर्शन तो हुए थे, लेकिन तब तक सूरज समुद्र से ५ फीट ऊपर आ चुका था। बादलों ने सूरज को छिपा लिया था, भले ही किरणें छनकर हम तक पहुँच रही थी, आँखों को एक बेहतरीन दृश्य देखने को मिला भी, किन्तु जैसे एक चीज थोड़ा अपूर्ण रह गयी हो। पिछले दोनों ही प्रयास ‘साउथ मियामी बीच’ पर किये गए थे। इस बार हमने तय किया कि ‘फोर्ट लॉडरडेल बीच’ से अपने को कृतार्थ किया जाये। रविवार की सुबह ५-४५ पर हमारी सवारी घर से निकल पड़ी। जब निकले थे, तो अँधेरे का साम्राज्य छाया हुआ था। जैसे जैसे मिनट की सुई आगे बढी, हल्की हल्की सफेदी सी छाने लगी। हम ६-१५ पर समुद्र तट के समीप पहुँच चुके थे, कार को पार्किंग में डालकर हम रेत से होते हुए समुद्र के बिलकुल पास जा पहुंचे। लहरों के साथ आती हुई अपार जलराशि का एक कोना हमारे पैरों से खेलने लगा। हमारे पैर भी स्वयं ही पानी से खिलवाड़ करने लगे। पर आँखों का ध्यान सुदूर उस रेखा पर ही था जहाँ पर सागर आकाश एक दूसरे का हाथ थामे खड़े थे। आकाश के रंग कुछ ऐसे बदल रहे थे जैसे भानु भास्कर के स्वागत में पहले से ही दमकने लगे हों।


घड़ी की सुईयां जैसे ही सात के आगे पहुँची, सागर आकाश के मिलन की लंबी रेखा नारंगी होने लगी, विशेषत: बीचों बीच का दृश्य ही निराला था।



फिर जैसे जैसे चंद्रमा की कलाएं हर तिथि के साथ चंद्रमा की गोलाई बदलती हैं, उसी तरह की गोलाईयों में सूर्यदेव बाहर निकलने लगे। अंतर इतना था कि जहाँ चंद्रदेव पूरे आकार में आने में १५ दिन लेते हैं, वहीं सूर्यदेव ने यह कार्य कुछ ही मिनटों में निपटा दिया। शायद उन्हें भी यह भान है कि मनुष्य को उनसे मिलने वाली ऊर्जा की कितनी आवश्यकता है। उन्हीं की किरणों के साथ सारे काम प्रारंभ होते हैं, उन्ही की किरणों के अस्त होने के साथ सारे काम रूकने से लग जाते हैं।
एक घंटा वो सुबह हमने उस महान ऊर्जाश्रोत के साथ बिताई। ऐसा प्रतीत हुआ कि शरीर में वास्तव में ही कुछ ऊर्जा संचरण हो गया हो। वैसे भी समय पर उठने से पूरा दिन ही सार्थक सा लगता है, फिर इस दिन तो बात ही कुछ और थी। सूर्य को नमस्कार कर हमने अपने कदम वापस घर की तरफ बढाये, पर उस दर्शन की यादें हमेशा दिमाग में ताजा रहेंगी।

आप इन चित्रों का आनंद लें, अभी के लिए अलविदा।
- नीरज मठपाल
अक्टूबर २, २०१०

गुरुवार, 25 मार्च 2010

लैंप से लटकी परी

एक चौड़ी सी सड़क पर जब मैंने ठीक सामने 'स्टॉप' का चिह्न देखा, तो गाड़ी खुदबखुद ही रुक गयी। जब प्रतिदिन एक ही रास्ते से गुजरना होता हो, तो हाथ पाँव दिमाग के आदेशों की प्रतीक्षा नहीं करते बल्कि खुद ही सदिश बन जाया करते है। अन्य गाड़ियों के जाने का इंतज़ार करते हुए मैंने पीछे की सीट पर पड़ी पोलीथिन की तरफ़ झाँका, तो नज़र एक लकड़ी की बनी हुई छोटी सी परी पर गयी। कहने को तो ये एक सजावटी सामान भर था, पर असल में जैसे इसका श्वेत रंग शांति का, फूल - पत्ती प्रकृति का प्रतीक हो। इन्हीं विचारों के बीच गाड़ी स्वयं ही आगे बढ़ी और घर के नजदीक जाकर ही रुकी।

खरीदारी का सामान लेकर मैं और मेरी धर्मपत्नी रात के आठ बजकर बीस मिनट पर घर में घुसे, तो हमेशा की तरफ़ भाग्यवान ने सामान निकाल निकाल कर एक एक को फिर से परखना शरू कर दिया। हर सामान को देखकर उसकी मुस्कान और चौड़ी होती जाती जैसे अपनी खरीदारी पर गर्व महसूस कर रही हो। हो भी क्यों ना? आज 'डॉलर शॉप' पर मेहरबानी जो करी थी। एक छोटा सा बन्दर, फेंग शुई, दो चम्मच, एक मेढक की आवाज़ रहित मूर्ति। सभी धीरे धीरे कहीं न कहीं 'फिट' होने लगे। जिसे कहीं जगह ना मिली, उसे टीवी सेट के ऊपर, नीचे, आगे, पीछे किसी तरफ़ लगा दिया गया।

सब से निवृत होकर भाग्यवान हाथों में परी को नचाने लगी। बेचारी कभी इधर देखती, कभी उधर देखती, पर कहीं एक भी जगह न पा सकी जहाँ पर परी के लायक योग्य जगह मिल पाती। जब एक करूणा भरी नज़र से उसने मेरी तरह देखा, तो लगा जैसे साक्षात् प्रकृति माता हमारे घर में विराजमान होना चाहती है और हमारे पास एक योग्य आसन ही नहीं है। मैं भाग्यवान की यह छवि अधिक देर निहार नहीं सका क्योंकि मेरा हृदय दया भाव से भर गया और उसकी उसी पल सहायता करने की मैंने ठान ली। जब इन्सान एक बार कुछ ठान लेता है, तो सारी कायनात उसकी सहायता करने को आ जाती है। अंग्रेजी में एक कहावत है, "व्हैर दियर इज अ विल, दियर इज अ वे" और फिर यहाँ पर सवाल भाग्यवान का था, जिसके लिए तो मैं सागर पर्वत सब एक कर सकता था।

इसी सब विचार मंथन के बीच मेरी नज़र एक ५ फीट ऊँचे लैंप पर पड़ी, जो दो बल्बों की रौशनी में न सिर्फ स्वयं जगमगा रहा था, बल्कि पूरे घर को अपनी सफेदी की चमकार में नहला रहा था। बस फिर क्या था, जैसे ही मेरी नज़र उसके एक हुक पर पड़ी, परी आज से उसकी हो गयी। भाग्यवान के हाथों से परी को लेकर मैंने उसे लैंप पर टांग दिया। इस भाव विभोर दृश्य को देखकर सारी कायनात ख़ुशी से झूम उठी, देवताओं ने फूल बरसाएं, अनु मलिक ने मंगल गीत गाये और सारे कमरे में ख़ुशी का निवास हो ही गया।

इसी ख़ुशी से प्रेरित होकर एक लेखनी चल पड़ी लैंप और परी के इस महामिलन को शब्दों से अंकित करने। कृपया आप भी लैंप और परी को अपना आशीर्वाद दें, जिससे उनका मंगलमय जीवन और भी मंगलमय हो जाये।

- नीरज मठपाल
मार्च २३, २०१०

शनिवार, 22 अगस्त 2009

ताम्रपत्र

कई दिनों से एक बस को जाते हुए देख रहा हूँ मैदानी और पहाडी सडकों में कभी सीधे भागते हुए, तो कभी मोडों को हार्न की आवाज के साथ पार करते हुए। मन चाह रहा है कि बस से मैं भी बाहर देखूं पेड़ों को भागते हुए, घास को रंग बदलते हुए, सूरज को रोशनी मंद करते हुए।

इसी सब में आठ - नौ महीने निकल गए और मेरी सोच और लेखनी दोनों ही किसी दूर द्वीप में जाकर सो से गए। अभी मैं ख़ुद ही भटकते हुए बिना जहाज के पता नहीं कैसे इस द्वीप में जा पहुँचा। कुछ तो अलग सी ही सुनसानियत है यहाँ पर, कोई आहट भी नहीं, ना ही कोई परिंदा, ना पेड़। बस समुन्दर के बीच में लाल मिट्टी से बना एक ऊंचा नीचा पहाड़, जैसे समुद्र से किसी ने जबरदस्ती बाहर खींच निकाला हो उसे।

शायद वीरान जगह कहलाने के लिए ये बिल्कुल उचित द्वीप होता, अगर मेरी नजर जमीन पर गिरे एक बड़े से काले कपड़े पर नहीं पड़ती। भागा भागा पहुँचा मैं उस तक, बिल्कुल एक रुमाल की तरह पड़ा हुआ था, जिसमें सफ़ेद अक्षरों में लिखा हुआ था - " बंजर ख्यालों का भरा प्याला, जो प्रजा और राजा सबको मुक्ति देगा"

मैं इन शब्दों में कुछ खोजने का प्रयत्न कर ही रहा था, कि अचानक से उस कपड़े का रंग बदलकर नीला होने लगा और अक्षरों का काला। जैसे जैसे सूरज सर के ऊपर चड़ता गया, रंग बदलते गए। इस पहेली और पिछले तीन दिन की भूख प्यास से थका हुआ शरीर कब नींद के आगोश में समा गया, पता ही नहीं लगा। जब आँख खुली तो देखा आकाश में छोटे छोटे तारे टिमटिमा रहे थे, चाँद का कहीं कोई नामो - निशाँ ही नहीं था। अंदाजा लगाया कि जरूर अमावस्या रही होगी। शायद तारे टिमटिमा कर यह अहसास दिला रहे थे कि धरती के किसी भाग पर आज दिवाली मन रही होगी।

रात बड़ने के साथ ठंड भी बड़ने लगी थी। मैं यूँ ही प्राणरहित सा गोल मोल होकर पड़ा रहा उस कपड़े से अपने सिर को ढकने का प्रयास करता हुआ सा। जब अगली सुबह देखने की आशाएं धूमिल सी होने लगी, तभी कान में जोर जोर से तलवारों के टकराने की आवाज सुनायी देने लगी। मन में आशा जागी कि काश ये आवाज मेरे सैल फ़ोन की किसी रिंग टोन की करामत हो। लेकिन मन अभागे को कहाँ पता था कि ये तो दुनिया ही कोई दूसरी थी, समय ही कोई दूसरा।

किस दुनिया मैं पहुँच गया था मैं और कौन सा समय था ये? क्या मैं ये जानने में सफल हूँगा? क्या मुझे द्वीप में इतिहास की कुछ अनकही, अनसुनी परतों से धूल हटाने का मौका मिलेगा? या फ़िर मैं ...?

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शीर द्वीप सभ्यता; १२४२० ईसवी पूर्व। शीराष्ट्र देश।

यह वही जगह है जहाँ आज अरब सागर भारतवर्ष के पश्चिमी किनारों पर दस्तक देता रहता है। पर एक समय वहाँ पर जल के नाम पर केवल एक विशाल नदी बहा करती थी - "देवंत्रित" नदी। नदी भी ऐसी कि उससे दस छोटी धाराएँ निकलकर शीराष्ट्र के सभी महत्तवपूर्ण स्थानों को पेयजल प्रदान करती थी। किवदंती यह थी कि जिस भी जगह हजार भले लोग रहते होंगे, शीर नदी स्वयमेव उस स्थान के लिए एक धारा को मोड़ देगी। कई युगों से यह देश संपूर्ण विश्व का राजनीतिक एवं आर्थिक केन्द्र था। इस देश के ऐतिहासिक ताम्रपत्रों और भोजपत्रों से पता चलता था कि लगभग ४८००० ईसवी पूर्व मानव का अभ्युदय हुआ था, जो कि एक नयी शुरुआत भर थी। ऐसे ही कई युग पहले आकर जा चुके थे। सृष्टि का चक्र निरंतर गोल घूमता ही रहता था। एक चक्र ६४००० वर्ष चलता था, उसके बाद १२८००० वर्ष कि अबूझ शान्ति के बाद एक नए चक्र का आरम्भ होता था।

यदि चक्र का यह कथन सत्य है तो अभी मेरी सृष्टि के वास्तविक (माना कि ये २००९ ईसवी है) वर्ष के हिसाब से १३९९१ वर्ष और शेष हैं। अभी मैं इस बात से अनजान हूँ कि मैं कैसे देख पा रहा हूँ आज से १४००० वर्ष पूर्व का समय? क्या ये सर पर ढका हुआ रंग बदलता कपड़ा, कपड़ा नहीं बल्कि किसी ख़ास इतिहास का आईना है?
शीर वंश के राजा नृपदेव का दरबार। लगभग ३०० * ३०० फीट में फैला हुआ एक विशालकाय कक्ष, जो बीच बीच में हीरा पन्ना जडित विशालकाय स्वर्ण स्तंभों पर टिका हुआ था। हर स्तम्भ एक अलग युग की गाथा कहता था।

इससे आगे कि मैं कुछ जान पाता, मेरी एकाग्रचित्तता ने मेरे साथ और किसी सामान्य दिन की तरह ही मेरा साथ छोड़ दिया। समय में झाँकने की मेरी कोशिश अवश्य ही होगी; जैसे ही कुछ और परतें खुलती हैं, मैं उन्हें अंकित करता हूँ। तब तक ... ताम्रपत्र तो कहीं न कहीं जरूर है, खोज जारी रहे।

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मेरे हाथ काले कपड़े से बंधे हुए थे और होंठों पर कुछ खून जमा हुआ था, पूरा शरीर दर्द कर रहा था जैसे किसी ने मेरी जम कर पिटाई की हो। आँखे उठाकर ऊपर देखा तो पुलिसिया वर्दी में एक मोटे से इंसान को चाय पीते देखा। उसने आवाज दी, "क्यों रे छोकरे, जबान खोलेगा कि नहीं अब, या और पिटेगा? सहारनपुर पुलिस को मजाक समझ के रखा है तूने? १३ मर्डर करके बचके निकल जाएगा सोचा था तूने?"
मैं बुदबुदाया, "बंजर ख्यालों का भरा प्याला, जो प्रजा और राजा सबको मुक्ति देगा"

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अटलांटिक महासागर संयुक्त राज्य अमेरिका के सुदूर दक्षिणी तट पर लहरों के खेल में मगन था - इस बात से बेखबर कि एक पनडुब्बी १३ मृत इंसानों को ढोते हुए "की वेस्ट" की तरफ़ बढ़ रही है। अपनी मौलिक सुन्दरता के लिए विख्यात ये जगह आज कुछ ज्यादा ही व्यस्त लग रही थी। बीच किनारे हजारों की संख्या में बैठे लोग "सन बाथ" का आनंद ले रहे थे। एक हिन्दुस्तानी समूह, जिसमें ४ आदमी, ४ औरतें और ५ बच्चे रहे होंगे, पुराने हिन्दी गीत लगाए हुए खाने पीने में व्यस्त था; बच्चे एक दूसरे के पीछे भाग रहे थे, कभी कोई रेत में गिर जाता, तो बाकी के सारे बच्चे उस पर आ गिरते।

आलू पूरी की सुगंध मेरे मुहँ में बार बार पानी ला रहा थी, मन हुआ कि जाकर दो पूरी मांग ही लूँ। जब सुगंध असहनीय हो चली, तो मैं जा पहुँचा उनके पास। बात करने से पता लगा कि वो लोग मूलतः बुंदेलखंड से थे और लगभग ६४ वर्ष पूर्व अमेरिका आकर बस गए थे। सीडी प्लेयरमें आनंद का गाना बज रहा था, "जिंदगी कैसी है पहेली हाये, कभी ये रुलाये कभी ये हंसाये" । मुझे भी मन हुआ कि काश मेरे पास खूब सारे गुब्बारे होते अभी और मैं बच्चों में बांटता। ये विचार तब गायब हुआ जब पीछे से आकर एक बच्चे ने आके मेरा हाथ पकड़ा और बोला अंकल आपको कोई कहानी आती है?
दिमाग में वही कहानी टकराई, "बंजर ख्यालों... "

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क्रमशः...

- २२ अगस्त, २००९

रविवार, 27 जुलाई 2008

दा अमेरिकन हेयर कट

आप भी सोचते होंगे कि ये क्या बात हुई - अमेरिका का हेयर कट। पर इस बात में तो बहुत बात है। जो बाल कभी १०, १५ या २० रुपये में कटा करते थे, वो अब १५, २०, २५ डालर में कटा करते हैं। वो बाल, जिन्हें कटाने के लिए नाई से बस यही कहते थे कि आगे पीछे से छोटे कर दो और बीच में ठीक ठाक। उन्हीं बालों को कटाने के लिए कह रहे हैं - पीछे ३ नंबर की मशीन चला दो और छोटे कर दो बाकी। साथ ही आँखें बंद करके भगवान् से प्रार्थना कर रहे हैं कि भगवान् जब इन आँखों को खोलूँ तो अपना हेयर कट देखकर ख़ुद को ही सदमा न लग जाए। पर फ़िर भी किसी तरह सैलून से ऐसा कुछ व्यक्तिगत अनुभव तो मुझे हुआ नहीं कि मैं अपनी लेखनी को हेयर कट पर कुछ कागज बरबाद करने को बोलूँ। हाँ, अभी कुछ दिन पहले एक ऎसी घटना घटी जिसने मेरे हेयर कट को एक अति महत्त्वपूर्ण और अति संवेदनशील कार्य में परिवर्तित कर दिया।

जून २० - ये वो दिन था जब मुझे बाल कटाए पूरे ढाई महीने बीत चुके थे और किनारों से, पीछे से टेढ़े मेढ़े होते बाल रोज दुहाई दे रहे थे कि हमें काट दो, हमें काट दो। अब उन्हें कैसे समझाएं भाई तुम्हें काटने के लिए नाई के पास जाना पडता है। कोई तुम दाढ़ी थोड़ी हो कि तुम्हें रेजर से घिस डालूँ कभी भी, कहीं भी। पर आखिरकार एक ऐसा दिन आया जब " त्राहिमाम् , त्राहिमाम् " की ये पुकार मेरे कान के परदे फाड़ने लगी और मेरी अंतरात्मा ने कहा अब वो वक्त आ गया है जब मुझे अपने इन बालों की बलि देनी ही होगी। मेरे रूममेट के बाल भी अपनी सारी मर्यादाएं लाँघ कर गधे की पूंछ की तरह लंबे हो गए थे। तो वह भी अपनी केशराशि को बलिवेदी पर चढ़ाने के लिए व्यग्र था।

जुलाई ११ - शुक्रवार का दिन थे। हम आफिस से जल्दी निकले, आँखों में जूनून था बाल कटवाने का। दिल में तूफ़ान घुमड़ रहा था कि आज शरीर का वजन कुछ तो कम हो ही जायेगा। नाई की कैंची हमारा बरबस इंतजार कर रही थी। कुछ एक मील का रास्ता तय करते हुए हमारी कार मंजिल तक पहुँची। मेरे रूममेट की खुशी का बाँध छिपाए नहीं छिप रहा था। आख़िर हमने उस दुकान में कदम रख ही दिया, देखा कि वहाँ दो ही लोग थे, एक नाखून पे कुछ तो करवा रही थी और दुसरी आराम फरमा रही थी। हमें तो साफ़ साफ़ ही बोल दिया गया कि आज बाल काटने वाले जल्दी घर चले गए, अभी कोई नहीं है, कल आना। चलो, कोई नहीं, हमने भी सोचा कि एक ही दुकान थोड़ी है, अगली में गए तो वो बंद। अगली में गए तो वो भी बंद। अगली में गए तो वहाँ भी नाई भाग चुके थे। कुल मिलाकर एक घंटे ७-८ सैलूनों में चक्कर मारकर हम "लौट के बुद्धू घर को आए" को चरितार्थ करते हुए घर पहुंचे। सोचा कि कोई नहीं, कल चले जायेंगे।

जुलाई १२ - शनिवार का दिन। पूरा दिन सोने में ही निकल गया। शाम ६ बजे ध्यान आया कि बाल भी तो कटवाने हैं, फ़िर तो रविवार के दिन सैलून बंद रहते हैं। बस निकल चले घर से। पर पता चला कि शनिवार को ज्यादातर सैलून ४ या ५ बजे ही बंद हो जाते हैं। केवल एक ही सैलून खुला था जो ७ बजे तक खुला रहता है, पर चूंकि हमारी " अपान्ट्मेंट " नहीं थी वहाँ के लिए तो उसने भी बाल काटने से मना कर दिया यह कहकर कि किसी और कि बारी है, जब वहाँ तक कोई था ही नहीं। लेकिन उन्हें समय नहीं था, तो हम क्या कर सकते हैं। या फ़िर हमारी किस्मत में बाल कटाना ही ना लिखा था इन दिनों।

जुलाई १४ - सोमवार का दिन। आज तो प्रण करके ही चले थी कि आज बाल कटवाए बिना घर का मुँह नहीं देखेंगे चाहे कुछ भी हो जाए। पर फ़िर पता चला सोमवार को भी कई दुकाने बंद रहती हैं और जहाँ गए वहाँ वही ढाक के तीन पात। आगे कि कहानी क्या बताएं, बस हम भी जिद में थे कि कम से कम बाल कटवाने के लिए तो " अपाइन्ट्मेन्ट " नहीं ही लेंगे।

जुलाई १६ - मंगलवार को समय नहीं मिल पाया। आफ़िस के काम में ही उलझकर रहे गए, पर ये क्या , ये बुधवार का दिन भी वैसा ही निकला जब हम सोचने पर मजबूर हो गए कि इतना अगर बेकरार हम भारत की धरती पर होते, तो कोई नाई घर पर आकर ही बाल काट जाता। पर क्या हो सकता था, हम भारत में तो नहीं थे ना। ये भी सोच लिया कि क्यों न ख़ुद ही काट डालें, पर फ़िर बालों पर दया सी आ गयी।

जुलाई १७ - आज जब फ़िर से वही कहानी दुहराई गयी, तो हमने आख़िर अगले दिन के लिए शाम ७ बजे का "अपाइन्ट्मेंट" ले ही लिया। बालों कि व्यथा आन, बान और शान पर भारी पड़ ही गयी।

जुलाई १८ - आखिरकार जुलाई १८ का वो शुभ दिन आ ही पहुँचा, इन्तजार के बाद जब कुछ चीज मिलती है, तो उसका महत्त्व तो स्वर्ग मिलने के ही सामान होता है। बुकिंग होने के बावजूद हमारे दिल कि धड़कनें बड़ी हुई थी। मन में डर था कि कहीं आज वो दुकान बंद तो नहीं होगी। इस आशंकित मन के साथ कार पार्क करने के बाद जब हमने देखा कि सैलून के दरवाजे खुले है, तो साँस में साँस आयी। अन्दर जाते ही हैड नाई ने पुकारा, " मिली (सही नाम भूल गए हैं अब), तुम्हारे क्लाइंट आए हैं। हे प्रभु, ये क्या? जिंदगी में पहली बार अहसास हुआ कि हम नाई के लिए क्लाइंट हैं।

सिर पर पानी डालने के साथ नाई ने बाल काटने का शुभ कार्य प्रारम्भ किया। शकल देखने के बाद उसका पहला प्रश्न था, " हाऊ यंग यूं आर?" जैसे जैसे उम्र का हर दिन बढ़ रहा है, ये प्रश्न सुनकर और खुशी होती है। उसका दूसरा प्रश्न था," तुमने कब से बाल नहीं कटाये हैं?" मैंने सोचा तीन महीने से ऊपर हो गए हैं तो क्या बोलूँ, यही बोल दिया कि लगभग ढाई महीने हो गए हैं। उसके बाद जो कुछ हुआ वो सब कुछ एक हसीं सपने जैसा था। कुछ ही देर में हमारी केश्रशियाँ जमीन पर गोते खा रही थी। पंखे की हवा के झोंके उन्हें इधर उधर कर रहे थे। जैसे जैसे बाल नीचे गिर रहे थे, नाई बोल रही थी, "लाट्स आफ हेयर, लाट्स आफ हेयर"। चलो जैसे तैसे काम समाप्त हुआ, हम गदगद थे, बहुत खुश थे। उस सैलून के तो हम जिंदगी भर के लिए आभारी हो गए, जिसने हमें हफ्ते भर कि निराशाओं से निजात दिला दी थी। जहाँ और दिन २ डालर टिप में देते थे, आज ५ दे डाले। आते समय उसने मुझे बोला, "नेक्स्ट टाइम, डांट वेट फार टू एंड हाफ मंथ्स, कम इन फाइव वीक्स" । इस शानदार वाक्य के साथ ही एक मधुर मुस्कान का आदान प्रदान हुआ और हमने विदा ली। हम ५ हफ्ते या दो महीने की बात को नहीं सोच रहे थे, पर हाँ एक ख्याल दिमाग पर जरूर छाया हुआ था कि अगली बार से ३-४ दिन पहले ही "अपाइन्ट्मैन्ट" ले लिया करेंगे।

आज इस बात को पूरा एक हफ्ता बीत चुका है, पर आज भी इस हेयर कट की यादें एकदम ताजा हैं।

- नीरज मठपाल
जुलाई २७, २००८

रविवार, 6 अप्रैल 2008

नव वर्ष मंगलमय !!

आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है अर्थात हिंदू पंचांग के अनुसार नव वर्ष प्राम्भ हो रहा है। विक्रमी संवत २०६६। शक पंचांग के अनुसार भी यही नव वर्ष का दिन है, जब चैत्र का प्रारम्भ होता है। शक संवत १९३०।

यह नव वर्ष भारत के कई अन्य भागों मे अलग अलग नामों से मनाया जाता है। दक्षिण भारत के कुछ प्रांतों मे इसे उगादी के नाम से, तो महाराष्ट्र में गुडी पड्व के नाम से मनाया जाता है।

बचपन में हमारे घर पर आंग्ल पंचांग के अनुसार आने वाला नव वर्ष १ जनवरी को शेष दिनों की तरह ही गुजर जाता था, बस दूरदर्शन पर कुछ कार्यक्रम देख लेते थे। किंतु हिंदू नव वर्ष अपने साथ कई सारी खुशियों को लेकर आता है। घर पर तरह तरह के व्यंजन बनाये जाते हैं, नवरात्रियों की शुरुआत होती है, कई लोग ९ दिनों तक व्रत रखते हैं तथा देवी की उपासना करते हैं, जिसके उद्यापन के लिए कन्यापूजन किया जाता है। नवमी का दिन धार्मिक रूप से विशेष दिन है, क्योंकि पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान राम का जन्म इसी दिन हुआ था। प्रभु राम की ही याद में नवमी का पावन दिन रामनवमी के तौर पर मनाया जाता है। एक अलग ही तरह का हर्ष, उन्माद होता है इस दिन। पंडित, ज्योतिषी ग्रहों के आधार पर गणना करके वर्ष का पंचांग बनाते हैं। कई पंचांगों में देखने को मिलता है कि ईश्वरके घर में कौन राष्ट्रपति बना और कौन मंत्री प्रधान, किस राशि किस नक्षत्र का वर्ष शुभ अधिक है, किसका सामान्य आदि। सच में इस दिन विशेषतः लगता है कि पंचांग हिंदू जीवन शैली का कितना अहम् हिस्सा है।

आज भी इस नव वर्ष का अपनापन ही कुछ अनूठा है। आज मन अति प्रसन्न है। अभी मैं कुछ ज्यादा न लिखते हुए अपनी रसोई की तरफ़ बढता हूँ। आख़िर मुझे भी कम से कम आलू पूरी और कुछ मीठा बनाना चाहिए ना। हाँ, जानकारी के लिए इस संवत्सर का नाम " प्लव " है। गृह राज चन्द्रमा हैं और मंत्री सूर्य। धनेश बुध हैं और मेघेश शनि।

आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। यह वर्ष आप सभी के जीवन के लिए कल्याणकारी हो।
- नीरज मठपाल
अप्रैल ६, २००८

शनिवार, 15 मार्च 2008

किस्सा आम है

आज एक विचित्र सा ख्याल आया। आपने कभी सरिता, मेरी सहेली, गृह शोभा जैसी महिला
पत्रिकाएँ पड़ीं या देखी होंगी। आज सोचा की कुछ वैसा ही लिखा जाए। इन पत्रिकाओं की अपने अंदाज में टांग खींची जाए। तो फ़िर सुनाते हैं आपको एक किस्सा।

ये किस्सा है दिल्ली में रहने वाली एक गृहणी का। दक्षिणी दिल्ली के गोविन्दपुरी इलाके में रहने वाली मालती की शादी को अभी एक ही साल हुआ था। उसके पति विभोर एक सरकारी हस्पताल में कम्पाउन्डर थे। वैसे तो मालती एक हंसमुख मिजाज महिला थी, पर उसको पिछले कुछ समय से एक अजीब सा शौक लग गया था। डब्बे रखने का शौक। वैसे तो ये किसी भी मध्यम वर्गीय घर के लिए अनोखी बात नहीं। रसोई में हर चीज तो डब्बों के अन्दर आजादी की चाह में घुलती रहती है। पर मालती के दोनों कमरे तो जैसे डब्बों से ही भरे हुए थे। मिठाई के डब्बे, कपड़ों के डब्बे, चूड़ी बिंदी के डब्बे, सामानों के छोटे छोटे डब्बे, चाय पत्ती के पुराने डब्बे। जैसे डब्बों के लिए " इनकमिंग " सेवा तो अकूत हो, पर " आउटगोइंग " सेवा बंद पड़ीं हो। विभोर जब शाम को घर लौटते तो उन्हें सख्त हिदायत थी कि कोई भी डब्बा इधर से उधर नहीं होना चाहिए वरना उस दिन खाना ही नहीं बनेगा।

विभोर का मन इससे हमेशा उखड़ा उखड़ा सा रहने लगा था।

आज उनकी सालगिरह थी। मालती ने सोचा कि आज कुछ " गिफ्ट " खरीद के लाया जाए, जिससे पतिदेव खुश हो जायें और सारे गिले शिकवे मिट जाएं। बस निकल चली मालती की सवारी बाजार की तरफ़। पहले वो गयी फूलों की दुकान में, उसने सोचा फूल ले जाउंगी, घर को सजाउंगी। पर जब दुकानदार थैली में डालकर फूल देने लगा, आप समझ ही सकते हैं कि मालती उन्हें एक सुंदर से डब्बे में अच्छे से पैक करवा कर आगे बढी। फ़िर आगे जाकर विभोर के मनपसंद रंग की कमीज खरीदी और उसे शानदार डब्बे में पैक करवा के अगली दुकान की तरफ़ चली। वो जो भी लेती, हर जगह डब्बों में पैक करवाने का ख्याल उसका पीछा करता रहता।

जब वह घर पहुँचने वाली थी तो उसे अहसास हुआ कि क्यों आजकल विभोर उखड़े उखड़े रहते हैं, तो उसने इन नए डब्बों से सामान निकलकर डब्बों को कूड़ेदान में डाल दिया। इस सब के बाद वह उदास और हताश घर पहुँची। उसे डब्बों के न होने का दुःख तो था, पर वह खुश भी थी कि अब ये डब्बे उसके जीवन मे कलेश पैदा नहीं करेंगे।

अब आप सोच रहे होंगे कि इस किस्से में ख़ास क्या था। चलिए आप को शाम की बात भी बता देते हैं। शाम को विभोर भी मालती के लिए " गिफ्ट " लेकर आए, तो मालती अपना सर पकड़ कर रह गयी। विभोर की तरफ़ से सालगिरह का ये शानदार उपहार था - तीन बड़े बड़े डब्बे।

आशा है आपको गृह शोभा टाइप का ये किस्सा पसंद आया होगा। नहीं आया तो कोई परेशानी नहीं, आप इन महिला पत्रिकाओं के पाठक बन जाइए, फ़िर आने लगेगा।

- नीरज मठपाल
मार्च १५, २००८

शनिवार, 2 जून 2007

सड़क

सड़क यातायात का अहम साधन। पर अभी जिन सड़कों के बारे में सोच रहा हूँ, वो यातायात का साधन कम, विचाररूपी ‘मोटर’ को ईंधन देती 'मशीन' ज्यादा लग रही हैं।

जीवन का सफ़र अनेकानेक सडकों से गुजरता है जिन पर हम कई बार माता – पिता, भाई बहन, नाते – रिश्तेदार, दोस्तों के साथ घूमते हैं। वहीं कई बार अकेले भी एक वैचारिक मस्तिष्क को लेकर चलते हैं। फिर कहीं पर एकांत देखकर सड़क किनारे बैठ जाते हैं, कुछ देर बातें करते हैं, कुछ सोचते हैं, फिर वापस वहीं आ जाते हैं जहाँ से चले थे। पर कुछ लेकर ही वापस आते हैं, चाहे वह आत्मबल या प्रसन्नता में वृद्धि का कारण बने या फिर ह्रास का। साथ में हम कुछ अच्छे या बुरे क्षणों को भी जी चुके होते हैं।

कुछ वर्ष पहले मैं द्वाराहाट, बेरीनाग, डीडीहाट की सडकों पर अपने माता – पिता, अग्रजों का हाथ पकड़े चलता था। बाल मन उन्ही क्षणों में प्रसन्न रहता है। उसे और कुछ सोचने की आवश्यकता ही नहीं होती। उसके बाद पिथौरागढ़ में भी यह बाल मन ही रहा, अपने परिवेश को शरीर में समावेशित होते देखता रहा, पर यही वह समय था जब विचारों के रौंदे हुए जल से व्यक्तित्व की जड़ें सींची जाने लगी थी। नैनीताल, घुड़दौड़ी (पौड़ी), दिल्ली, बंगलौर की सडकों से होते हुए पिछले एक साल से यह जल अमेरिका की सडकों पर आ पहुँचा है। आज भी इसके सींचने की शक्ति कम नहीं हुई, ना ही बाल मन की जिज्ञासाएँ उत्पन्न होना छोड़ सकी हैं। युवाओं की ऊर्जा, जोश और जीवनी शक्ति उस बाल मन में मिली, तो विचार प्रवाह में गति सी आ गयी।

स्थिर रहना या स्थिर विचारधारा का होना अच्छी बात है पर फिर भी कहीं कुछ है जो कहता रहता है, “मेरी तो कोई विचारधारा ही नहीं है”। मन – मस्तिष्क इस बात का खंडन करता है। लेकिन “सही क्या है?”, इसका निर्णय कौन करेगा? कहीं से स्वयम् ही उत्तर आया कि इसका निर्णय अतिसंक्षिप्त वैचारिक विश्लेषण ही कर सकता है। उत्तर मिला बहुत साधारण पर अपने में कई सदियों को समेटे हुए – “जड़ें तो स्थिर रहती हैं। समय के साथ साथ वो और भी गहरी होती चली जाती हैं। पर तना, पत्ती, फूल आदि का कार्य तो गतिमान रहना है। सिद्धांततः चीजें नहीं बदलती, पर समयानुसार उनके क्रियान्वयन में परिवर्तन आवश्यक है। यही एक गतिशील मन, गतिशील मस्तिष्क और गतिमान व्यक्तित्व की विचारधारा है।”

अभी शाम को ही एक सड़क पर चलते हुए पुनः अहसास हुआ – “सड़कें तो बदलती रहती हैं, पर हमारा चलना नहीं बदलता। गतिमान जीवन गतिमान ही रहता है।”

- जून २, २००७
नीरज मठपाल

अनुभव

“जीवन एक रोचक सफ़र। अनुभवों से लहलहाते रास्ते। व्यापक रूप में मीठे अनुभवों की प्रतिशतता भारी, (आवश्यक) खट्टे, मिर्च लगे अनुभव भी पर्याप्त।”

उम्र के साथ - साथ अनुभव भी बढ़ता जा रहा है। प्रत्येक नया दिन, एक संभावित नया अनुभव। दृष्टिकोण भिन्न – भिन्न होने का विकल्प तो अभी भी उपलब्ध है, किन्तु जीवन की अजैविक गतिविधियों से सम्बंधित विचारों में कुछ स्थिरता सी आ रही है। विगत २१ वर्षों का प्रभाव स्पष्टतः प्रस्फुटित होने लगा है। यह स्थिति प्रत्येक के साथ आती है – चाहे वह जड़ हो या चेतन। चेतन मन की वास्तविक चेतना वही है जब वह ‘जड़’ को आत्मसात करते हुए चेतनामय रहे। यदि जीवन को वाच्यों में तौलें, तो स्थिति ‘मनुष्य’ की वास्तविक विशेषता की स्वतः ही व्याख्या कर देती है। उदाहरणार्थ,

कृतवाच्य – मनुष्य जीवन जीता है।
कर्मवाच्य - जीवन मनुष्यों द्वारा जिया जाता है।

उपरोक्त दो कथनों में ही संभवतः कुछ असत्यता हो, क्योंकि यह भी अनुभव आधारित हैं और अनुभव खट्टे भी हो सकते हैं, मीठे भी। जो भी हो, जीवन रस तो अनुभवों में ही है, वह भी तभी जब उनसे कुछ सकारात्मक ग्रहण किया जाये।

- नवंबर २६, २००१
नीरज मठपाल

कथन - ३

जीवन एक बाधा दौड़ है, बाधाओं को आसानी से पार करना, कठिनता से पार करना या पार ही न कर पाना कई कारकों पर निर्भर करता है। कदमों की नियमितता, गति में त्वरण, उपयुक्त उछाल (उपयुक्त समय एवं उपयुक्त स्थान पर) ऐसे ही कुछ कारक हैं। इन सब के लिए भिन्न – भिन्न प्रकार के व्यायाम, भोजन की आवश्यकता होती है। सुख के समय (बाधा दौड़ मे अवरोध रहित हिस्सा) शांत रहना एवं दुःख (कठिन अवरोध) में मुस्कराना ऐसे ही कुछ व्यायाम हैं। गप्पें (उचित मात्रा मैं), मनोरंजन, खेल, अध्ययन आदि दौड़ने हेतु आवश्यक उर्जा देने वाले भोजन हैं। सभी कारकों का अच्छा मिश्रण दौड़ को संतुष्टि प्रदान कर सकता है, जबकि गलत अनुपात में बना मिश्रण कसैला स्वाद ही देता है। तो यदि स्वाद को समझते हों, तो उचित व्यवहार से पूर्ण दौड़ में भाग लें, अन्यथा सब चलता है।

- दिसंबर १३, २००३
नीरज मठपाल

बुधवार, 23 मई 2007

लघु कहानी

अलि के आगमन से प्रफुल्लित पुष्प ने बसंत की मन्द-मन्द प्रवाहित होती वायु को रोककर पूछा, "मलयांचल से आते हुए क्या तूने राह में किसी मेघ को प्राची की ओर जाते देखा है?"

असमंजस में पड़कर अलि (भ्रमर) ने पुष्प से तथ्य को स्पष्ट करने का निवेदन किया। तब पुष्प व्यथित होकर बताने लगा, "जो मेघ अभी यहाँ से गुजरा है, वह पृथ्वी से आ रहा था। वहाँ प्रकृति मनुष्य के आतंक से असहाय होकर अपने अन्तिम दिनों को गिन रही है। दूषित वायु और जल पृथ्वी को अधिक समय तक रहने नहीं देंगे। विषैले रसायनों से भरे उस काले मेघ को मैंने अभी अभी यहाँ से गुजरते हुए देखा है। यदि वह प्राची की ओर चला गया, तो वहाँ के मनोरम पर्वतों से टकराकर अपने अन्दर का सारा जहर बिखेर देगा, और तब यह देवस्थली भी स्थान-स्थान पर कराहती नजर आयेगी।”

पुष्प की बातें सुनकर भ्रमर को मधु का स्वाद कसैला सा प्रतीत हुआ। वह वायु से बोला, “हे मलयपवनों! मुझे तीव्रता से बहाकर उन शक्तिसंपन्न देवों के पास ले चलो, जिन्होंने अपने पराक्रम, ज्ञान एवं विवेक से कई राक्षसों, दैत्यों का अभिमान चूर किया है। मैं उनसे मानवों के अत्याचार से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना करूंगा।”

वायु जाते जाते पृथ्वी में ईश्वर-मनुष्य के संबंध में बताने लगी, “वहाँ इतने ईश्वर हैं कि स्वयम् ईश्वर भी नहीं समझ पाता कि अपने पास मनुष्यों का ही खाता रखे या फिर धरती के ईश्वरों के लिए भी बड़े-बड़े खाते बनाए। अतः ईश्वर ने भी मनुष्यों को धरती के अनेकों स्वनामधन्य ईश्वरों के हाथों में छोड़ दिया है और वह भी परम शक्ति से प्रार्थना कर रहा है कि अपनी इस अनुपम कृति को शीघ्रातिशीघ्र मिटा दे।”

इस वार्त्तालाप के अन्तिम चरण में तीनों प्रतिभागियों ने कालिमायुक्त मेघ को पुनः पृथ्वी की ओर जाते हुए देखा। मेघ के स्वर में एक गर्जना थी।

- नीरज मठपाल
फरवरी १३, २००४

शुक्रवार, 18 मई 2007

ऐसे ही


इन्सान का दिमाग भी बड़े जोर की चीज है। पता नहीं क्या – क्या सोचता है। बच्चों की खुरापाती सोचों से लेकर युवाओं के दिवा स्वप्नों तक, अधेड़ लोगों की व्यवहारिक सोचों से लेकर वृद्धों की दार्शनिक सोचों तक अति विस्तृत क्षेत्र इसमें समाहित हो जाता है।

अभी इस लिखते हुए अपनी तरह के अजूबे नमूने को ही लो। पिछले एक घंटे में दस अलग अलग चीजें सोच चुका है। सामने काफी का कप रखा है, उसमें थोडी सी काफी बची है। पता नहीं इन्सान को काफी के पौधे को पीने वाली काफी में तब्दील करने में कितने साल लगे होंगे। गजब ही ठैरे हमारे पूर्वज भी। मीठी, खट्टी, कड़वी, नमकीन जिस भी चीज को जैसे भी खाने का जुगाड़ बना सके, बना लिया।

वो ज़रा दूर देखो - चिडियों का एक समूह आकाश में उड़ रहा है। पर ये मौन क्यों है? इतने बड़े समूह का शांत रहना थोड़ा दुर्लभ तो है, पर फिर भी इसकी औरतों के एक शांत बैठे समूह की दुर्लभता से तुलना तो नहीं ही की जा सकने वाली ठैरी।

वो वहाँ पर एक कुर्सी रखी है चार टांगों पर खड़ी। उसी के बगल में पहियों वाली कुर्सी भी इतराते हुए शांत पड़ी है। दो चार पहिये लगा दिए उस कुर्सी को तो इसमें इतराने की बात क्या है? पर उसे समझाये कौन? निर्जीव वस्तुओं को बोलना भी तो नहीं आने वाला ठैरा।

अगर आपको ऊपर प्रयुक्त शब्द “ठैरा” का मतलब समझ नहीं आ रहा ठैरा, तो पूछना मत कि “ठैरा, ठैरा क्या ठैरा”। ये हम पहाडियों का “ट्रेड मार्क” है। इसके सर्वाधिकार पहाडियों के नाम बाबा आदम के ज़माने में ही सुरक्षित हो चुके हैं।

इन सब बातों का तात्पर्य यही है कि दिमाग भी कैसी छोटी से छोटी, फिजूल से फिजूल और बड़ी से बड़ी, उपयोगी से उपयोगी बातें और विचार सोच लेता है। अगर ये दिमाग सामने आकर खड़ा हो जाये, तो इसे एक चांटा लगाकर बोलूं कि धन्य हो प्रभु, आप धन्य हो। चांटा इसलिये कि दिमाग के भाव ज्यादा ना बढ़ जायें।

खैर, मजाक की बात अलग है, पर यह जरूर कहूँगा कि इस दिमाग को रोटी पानी देते रहिए। दिमाग खुश रहेगा तो आप खुश रहेंगे। बाकी गप शप फिर कभी। मैंने अब खाना भी तो पकाना ठैरा।

- नीरज मठपाल

मई १८, २००७

गुरुवार, 10 मई 2007

एक दोपहर

आज पहाड़ों की एक दोपहर की सैर की जाये। उसमें भी अगर महीना जनवरी का हो तो कहना ही क्या। पहाड़ों का मतलब माउन्ट एवरेस्ट या नंदा देवी सरीखी पर्वत चोटियों से न निकालें। हम तो उन शांत पहाड़ी इलाक़ों की बात कर रहे हैं जहाँ ज़िन्दगी की रफ़्तार कुछ कम सी होती है, जहाँ किसी इलाके के लोग एक दूसरे से अजनबी नहीं होते बल्कि एक घुले मिले समाज का हिस्सा होते हैं, जहाँ लोगों में एक अनूठा अपनापन होता है।

तो चलते है उत्तराखंड के इन पहाड़ों में।

जाड़े के इस मौसम में सूर्य ही सबसे बड़े देवता हैं। जिस दिन वो अपनी प्रखर चमक लिये धरती की सेवा में हाजिर हो गए तो मानो जैसे पहाड़ियों का तो बसंतोत्सव आ गया। आज भी ऐसा ही एक दिन है। सुबह जब ९ बजे के आसपास दूर आकाश से आती गुनगुनी धूप का अहसास हुआ, तभी लगा कि शरीर में प्राण पूरी तरह से आ गए हैं। जैसे सिकुड़ी हुई हड्डियों को थोड़ा ताकत मिल गयी हो। आनन फानन मे पूरे पड़ौस के गद्दे और रजाईयां भी धूप में सूखने के लिए बाहर आ गए। पिछले कई दिनों से जो घरेलू काम अधूरे से पड़े थे, पलक झपकते ही आज फ़टाफ़ट होने लगे। इसी सब आपाधापी में दोपहर का एक बज गया।

अब ज्यादातर औरतें और बच्चे बाहर चटाईयां बिछाकर बैठे हुए थे। परुली की ईजा सूपा लेकर गेहूँ बीन रही थी। बाकी सभी औरतों की अंतहीन गप्पें शुरू हो गयी थी।

कुछ लोग हरया के बौज्यू की दुकान के बाहर सुबह से ही बैठे हुए थे और बीड़ी के धुएं के बीच सारे देश कि समस्याओं पर बहस कर रहे थे। इन लोगों की फसक का कोई ओर छोर तो होता नहीं है, फिर भी यही उनकी रोज की दिनचर्या का हिस्सा था।

कुछ बच्चे एक लकड़ी के फट्टे और प्लास्टिक की गेंद से बैट बाल खेल रहे थे। बातें उनकी ऎसी जैसे की बड़े होकर सभी ‘सेंचुरी’ मारने वाले बनेंगे।

इसी सुहावने दिन में कहीं से एक आवाज सुनाई दी – “चादर वाला.......”। धीरे धीरे आवाज तेज होती गयी। थोड़ी देर में एक चादर वाला अपनी पोटली खोले बैठा था और सारी औरतें उसे घेरे हुए थी। कोई खड़े होकर चादरों को फैला फैलाकर देख रही थी तो कोई बैठकर ही उनमें कमियाँ निकाल रही थी। खरीदना किसी ने कुछ नहीं था, पर मोल भाव पूरे जोरों पर था। आख़िर में एक गिलास पानी पीकर चादर वाला औरतों के अगले समूह की खोज में आगे बढ़ गया।

इसी बीच रधुली की ईजा ख़ूब सारे माल्टे (संतरे कि तरह का एक फल) ले आयी। नमक मिर्च लगाकर माल्टे खाना शुरू ही किया था कि पता चला कि सुरया की आमाँ के यहाँ नींबू सन रहा है। ये वो छोटे वाले नींबू नही होते, ये बड़े से नीम्बू होते हैं, जिन्हें छीलकर दही और गुड़ या चीनी के साथ साना जाता है। साथ में थोड़ा पिसी हुई भांग, थोड़ा मूली या केले मिला दो तो कहने ही क्या। जब नींबू सनकर तैयार हो गया तो थोड़ा थोड़ा वो सब लोगों में बाँटा गया। सभी इस नींबू की सुबह से प्रतीक्षा में थे क्योंकि ये तो निश्चित ही था कि किसी ना किसी के यहाँ आज नींबू जरूर सनेगा।

जब सभी चटखारे लेकर खा ही रहे थे तो कहीं से दो आवाजें सुनायी दी – “साड़ी वाला .......”... “चूड़ी – बिंदी वाला .......”। कोई आश्चर्य नहीं कि साड़ी वाले की परिणति वही हुई जो चादर वाले की हुई थी। लेकिन चूड़ी – बिंदी वाला खाली हाथ नहीं गया। कुछ लाल पीला सामान वो सस्ते दामों में उस समूह के सुपुर्द कर गया।

अब चार बज चुका था और सूरज भी ढलने लगा था। सभी लोगों ने अपनी अपनी चटाईयां समेटनी शुरू कर दी। धीरे धीरे सभी अपने घरों को खिसकने लगे। सभी के मन में यही प्रार्थना थी कि ऎसी दोपहर कल फिर आये।

अब मैं भी खिसकता हूँ। मेरी भी यही प्रार्थना है कि ऎसी दोपहर कभी कभी आती रहे।

- नीरज मठपाल
मई १०, २००७

बुधवार, 2 मई 2007

कथन - २

प्रभात रेखा के दृगावरण से टकराते ही तंत्रिका तंत्र में एक मधुर झंकार हुई। मध्यमा और तर्जनी ने कम्पन करते हुए ललाट को संकुचित होने का संदेश दिया। संकुचन के पश्चात् एक स्वर गूंजा और अनुभव प्रथम बन्धन के चक्रव्यूह को भेद चुका था। क्या भेदन के लिए ॐ या अन्य कोई स्वर समूह आवश्यक था? या कोई प्रेरणा आवश्यक थी? संभवतः हाँ। अवचेतन से चेतन में आने के लिए एक ध्वनि या एक प्रेरणा आवश्यक है।


- नीरज मठपाल
फरवरी २०, २००४

कथन - १

कभी - कभी हम यूँ ही चल रहे होते हैं और साथ चलती खामोश परछाईयों को चाहकर भी नहीं देख पाते। एक ऐसा भाव प्रतिरोधक बना रहता है जो जमीन की ओर सिर रहने पर भी छाया को महसूस नहीं कर पाता। आदमी यदि अपनी पहचान को खोता हुआ पाता है, तो कहीं न कहीं छाया के विपरीत देखने का दुस्साहस इसका एक कारण है।

- नीरज मठपाल
मई २८, २००४

रविवार, 29 अप्रैल 2007

अपाहिज


मौसम अभी खराब सा है। अत्यंत मद्धिम रोशनी में झूमर ख्यालों में आ जा रहा है। बाहर से आती हुई किसी समारोह की आवाजें कानों में दर्द सा कर रहीं हैं, लेकिन झूमर की ज़िन्दगी में इन आयोजनों का कोई लेना देना नहीं। उसके लिए मेहनत की दो वक़्त की सूखी रोटी भी पकवानों से बढ़कर है। फिर आँते भी वही खाना पचा पाती हैं, जिनसे उनका रोजाना का परिचय हो। गंदला पानी भी गंगा की निर्मल धारा बन जाता है यदि वह आत्म सुख देता हो। कोई कितनी आसानी से झूमर की स्थिति देख कर कह जाता है - " इस ज़िन्दगी से तो मौत अच्छी"। लेकिन झूमर को कोई शिक़ायत नहीं। वह अपने जीवन के सत्य को आत्मसात कर चुका है, मौत जैसी झूठी घटना पर उसे विश्वास ही नहीं। इसे ईश्वर प्रदत्त शक्ति ही कहिये या ज़िन्दगी ने ही झूमर को जड़ - चेतन में फर्क करना समझा दिया है।

* * * * *

पीलीभीत रेलवे स्टेशन पर सैकड़ों यात्री जमा हैं। कुछ अपनी गाड़ी के आने के इंतजार में पसीना बहा रहे हैं, तो कुछ अपने गंतव्य पर सही-सलामत पहुँचने की ख़ुशी में पसीना सुखा रहे हैं। उष्णता (गर्मी) तो वही है, बस स्थितियाँ ही पसीने के विभिन्न रूप दिखा रही हैं। हावड़ा एक्सप्रेस के 'स्लीपर क्लास' से उतरा एक संभ्रांत परिवार जैसे ही 'प्लेटफार्म' से बाहर खुली सड़क पर पहुँचता है, तो तीन चार बच्चों को अपनी ओर लपकते हुए पाता है। बच्चे आठ से बारह वर्ष के रहे होंगे। शरीर पर टंगी हुई फटी कमीजें और नीचे टल्ली लगे हुए नेकर। पाँवों के तलुए तो जल-जल कर ऐसे हो गए हैं कि उबलते पानी में डलवा लो, तो पानी ठंडा हो जाएगा। पेट जरूर सभी के ठीक से लग रहे थे, शायद भीख पर्याप्त मात्रा में मिल जाती होगी। बच्चे अब परिवार के सदस्यों को घेरकर अन्न याचना कर रहे हैं। महिला तो बस घृणाभाव से दूर हट जाती है, लेकिन उनके श्रीमान दो रूपये का सिक्का ज़रा दूर से ही फैंक देते हैं। वहीं एक कोने में झूमर नम आँखों से बैठा है।

* * * * *

झूमर से मेरा पहला और अन्तिम परिचय लखनऊ जाते समय ट्रेन में हुआ था। ट्रेन तब पीलीभीत से चलना शुरू ही हुई थी। एक असहाय सा दिखने वाला आदमी अपने घुटनों पर घिसटता हुआ आया। चेहरे पर दाढ़ी बेतरतीब ढंग से बढ़ी हुई और प्रश्न पूछती सी बड़ी बड़ी आँखें। उसके दो पाँव और एक हाथ बीते वर्षों कि तपिश मे कहीं लुप्त हो चुके थे। ज़िन्दगी की शायद इकलौती बची हुई पूंजी बाँयें हाथ में एक झाड़ू पकड़ा हुआ था। पता ही नहीं चला कब उसने फुर्ती से पूरा 'केबिन' साफ कर डाला। सफाई भी ऎसी कि क्या मजाल कोई खोट निकला जा सके। लेकिन ये सफाई तो मुझे उसके जाने के दस मिनट बाद दिखी। उसके करतब को देखकर तो मैं शब्दहीन हो गया था। उसने झाड़ू लगाने के बाद अपना हाथ एक बार मेरी तरफ बढ़ाया भी था। किन्तु मैं तो जड़वत था - मस्तिष्क से भी और शरीर से भी। उसकी जीवनी शक्ति मेरे लिए किसी परम शक्ति से कम नहीं थी। अनायास ही मुझे उसमें स्टीफ़न हाकिंग का कुछ अंश भी दर्शित हुआ था। लांस आर्मस्ट्रांग की साईकिल के पहिये भी दौड़ते नजर आये थे उन आँखों में। हर व्यक्ति का अपना अलग 'प्लेटफार्म' था, पर सभी की जिजीविषा शक्ति 'अनुकरणीय'।


जब इन ख्यालों की तन्द्रा टूटी, तो मैं उसके पीछे भागा। वह एक दूसरे केबिन में अपने काम में व्यस्त था। बस मैं उसके काम को अपलक निहारता ही चला गया। मेरे लिए उस समय वही मानव शक्ति का सर्वोच्च प्रतीक था। अगले ही स्टेशन पर वह मेरी आँखों से ओझल हो गया। साथ में दे गया एक अनकहा संदेश।

* * * * *

अभी दरवाजे पर किसी ने खटखटाया तो ध्यान आया की बारिश बंद हो चुकी है। जब इस पृष्ठ को फिर से पढ़ा तो लगा कि झूमर का मेरे जीवन मे प्रवेश हो चुका है। शायद प्रवेश तो उसी ट्रेन में हो चुका था, पर झूमर नाम तो उसे आज ही मिला है। झूमर अपाहिज नहीं है। अपाहिज शरीर नहीं, अपाहिज तो सोच होती है। झूमर की सोच अपाहिज नहीं।


- नीरज मठपाल
मई ३, २००३

बुधवार, 25 अप्रैल 2007

प्राकृतिक दृश्य


बात उस जमाने की है जब डब्बू की ‘हाइट’ साढ़े तीन फ़ीट के आस पास हुआ करती होगी। यकीन से तो नहीं कहा जा सकता, पर फिर भी वो पैन – पेंसिल अच्छी खासी चलाने लगे थे। उन्हीं दिनों एक शब्द ने उनकी ज़िन्दगी में हलचल मचाना शुरू किया – ‘कला’ यानी की ‘आर्ट’। ज्यादा कुछ तो नहीं पर आम, केला, चार रंगों का गोला ही उनके लिए 'आर्ट' था। जैसे इन्हीं तीन चार ‘ड्राइंग्स’ में पूरा कला संसार निपट जाता हो। वो भी उनके लिए ‘आर्ट’ कम, एक बड़ा ‘बवाल’ ज्यादा था।

ऐसे में एक दिन एक विपत्ति सामने आ खड़ी हुई। उन्हें ‘होम वर्क’ के तौर पर ‘प्राकृतिक दृश्य’ बनाने के लिए दे दिया गया। जिस मासूम के लिए प्राकृतिक और कृत्रिम वस्तुओं में अंतर करना ही कठिन हो, उसके लिए एक पूरा दृश्य रंगों से उकेर देना किसी नए तारे की खोज करने के ही समान था।

ये कला भी बड़ी ही विचित्र चीज है। सब कहते थे, “ कला तो एक खेल की तरह है – मानव की रचनात्मक और मौलिक प्रतिभा का आईना। ना जाने आज तक कला की पूजा – भक्ति में कितने जीवन समर्पित हो चुके हैं। एक सामान्य मजदूर और किसान से लेकर बड़े से बड़े नेता और धनी लोग विभिन्न कलाओं का प्रयोग एवं प्रदर्शन करते आये हैं। जीवन के हर क्षेत्र में कला विद्यमान है”।

पर कब्र का हाल तो मुर्दा ही जानता है और ये सब बड़ी बड़ी बातें डब्बू के लिए एक कोरा एवं अर्थहीन ज्ञान था। उस मासूम बचपन के लिए तो टेढ़ी मेढ़ी ‘ड्राइंग्स’ ही ‘आर्ट’ थी। वो तो बस किसी तरह ‘प्राकृतिक दृश्य’ की पहेली को समझने का प्रयत्न कर रहा था। ऐसे में जैसे ही संकट-मोचक को याद किया तो माँ स्वयम् कला की साक्षात् देवी बनकर सामने बैठी हुई दिखी। माँ के केवल चार शब्दों ने सारी प्राकृतिक अदृश्यता को उसके लिए पूर्णतः दृश्य बना दिया –

१ - पर्वत (या पहाड़)
२ - नदी (या तालाब)
३ - सूरज (या चन्द्रमा)
४ - पेड़ – पौधे

लगा कि जैसे सारी प्रकृति माँ के हाथों में सिमट आयी हो। हाथों में हाथ रखे पेंसिल ने चलना शुरू किया। थोड़ी ही देर में पन्ने पर कई सारे रंग फैले हुए थे। प्रकृति पूरे श्रृंगार के साथ कागज के उस पतले आयताकार पन्ने पर विराजमान थी। उसका मनोहारी रूप मन पर अंकित हो चुका था। कला की परिभाषा सार्थक एवं स्पष्टतः परिलक्षित हो चुकी थी।

आज जब भी प्रकृति को उसके जीवंत रुप में महसूस करता हूँ तो पास में ही कहीं वो पन्ना भी अपना प्रकाश फैलाता दिखाई देता है, मानो पन्ने से सारे रंग उड़कर पूरी पृथ्वी में फ़ैल गए हों।
- नीरज मठपाल
अप्रैल २५, २००७

सोमवार, 23 अप्रैल 2007

सागर


कभी शांत पानी का विशाल ढेर। कभी उछलती लहरों का प्रतीक। बचपन से ही किस्से – कहानियों में, टीवी के परदे पर और फोटो में अथाह सागर और उसकी लहरें एक आकर्षण का केंद्र रही थी। भारत के दक्षिणी प्रायद्वीप के समुद्र तटीय भाग से साक्षात्कार आंख मिचौली खेलता रहा। मुम्बई, गोवा, पांडिचेरी, विशाखापत्तनम, कन्याकुमारी के समुद्र तट यथार्थ होते हुए भी कल्पना ही बने रहे। समय पंख लगाकर धीरे धीरे उड़ता रहा। जब पहली बार अपने को सागर के सामने पाया, तो अटलांटिक महासागर कि लहरें अट्टाहास करती मिली। सुन्दरता ऎसी कि एक तरफ मैं प्रकृति के इस रहस्य को समझने का प्रयत्न कर रहा था, वहीं कुछ ही दूर मानव मस्तिष्क की विजय का प्रतीक गगनचुम्बी इमारतें जैसे प्रकृति के सम्मान में खड़ी हो गयी हों। सागर और आकाश में इस बात के लिए मौन होड़ लगी थी कि जीवन मे किसका नीला रंग ज्यादा गहरा हैं। मैं अवाक् सा भूमि पर खड़ा गदगद मन और शून्य दिमाग से इस त्रिवेणी संगम को नीहार रहा था। धरती, आकाश और समुद्र के इस मिलन का साक्षात् गवाह ही मूक था। तभी हवा का एक झोंका मेरे बालों को आँखों पर ले आया। त्रिकोण का चौथा कोण 'वायु' स्पष्टतः इस खेल को और रोचक बनाने लगा। बालमन हुआ कि गीली रेत को हाथों में लेकर उससे खेलता रहूँ। एक पतंग हाथ में लेकर इधर से उधर दौड़ता रहूँ। अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ ख़ुशी से चिल्लाता रहूँ। इन्हीं सब ख्यालों के बीच जब दूर क्षितिज पर निगाह गई, तो देखा कि सूर्य की लालिमा ढलने को थी। इस ढलती लालिमा ने जैसे मेरे शरीर के पंच तत्त्वों को मेरे सामने सजाकर रख दिया हो। ये शाम मेरे लिए आत्म – साक्षात्कार की शाम थी। समुद्र दर्शन ने मुझे एक पूर्णता सी प्रदान कर दी थी। मेरे कदम मानव निर्मित इमारतों की तरफ बढ़ने लगे। चेहरे पर एक कोमल मुस्कान तैरती रही। आज लगभग दस महीने बाद यह लिखते समय चेहरे पर फिर एक कोमल मुस्कान है।

- नीरज मठपाल
अप्रैल २३, २००७