मंगलवार, 12 नवंबर 2013

कुछ पल कोठी के साथ

(अंग्रेजो के समय की बनी एक कोठी को समर्पित, जो बचपन और किशोरावस्था के कई चित्रों को आज भी रंग भर देती है)  

आज एक बहुत अरसे बाद उस बड़ी कोठी में होकर आया 
सौ साल पुराने देवदारु के सामने खड़ी उस पुरानी इमारत को निहार कर आया 
उन बड़ी घुमावदार सीढियों पे छलांगे मारते हुए एक बार फिर खुद को पाया 
धूल की मोटी परत से सनी लम्बी आरामकुर्सी पे खुद को लम्बा होते पाया

जिस कोठी में कभी कहकहे गूंजा करते थे 
आज कह पाना मुश्किल था कि यह उसकी नितांत शांति थी या घुप्प अँधेरा 
जो मन को ऐसे अशांत कर रहा था 
जैसे कहकहों और ठठाकों को ठंडी हवाएं उड़ा ले गयी हों 

भूतहा पिक्चरों में अक्सर दिखते हैं 
ऐसी ही कोठियाँ और ऐसे ही उपस्कर (फर्नीचर)
पर नहीं दिखता उनमें वो जीवन अमृत 
जो शायद अब भी इन मजबूत लकड़ियों में बंद पड़ा है 

कोठी के भाड़ से ऐसी आवाज रुक रुक के आ रही है जैसे 
तीन चार भूत कुछ लड़ते हो, फिर कुछ इंतेज़ार करते हों प्रतिक्रिया का 
धड़कन थोड़ी तेज जरूर चल रही थी पर बीता समय गवाह था 
ये भूत नहीं लंगूरों की कोई तो प्रतियोगिता थी मालिकाना हक जताने की 

कोठी के बायीं तरफ की बालकनी में डगमग डगमग दो कदम सावधानी से रखे 
फिर तिलंगे की शीशेदार विस्तृत खिड़कियों से बाहर के पूरे दृश्य को आँखों में समाया 
कोठी के कुछ कमरों को ठकठकाने का अवसर बीच बीच में मिलता रहा 
लेकिन उन बड़ी अलमारियों में छिपने का निराला अनुभव बस सोच ही पाया 

आज फिर उसके आंगन में थोड़ी देर बैडमिंटन खेल आया 
दरवाजे के एक टूटे शीशे को बॉल से थोड़ा सा और तोड़ आया 
ऐसे ही अचानक हुए इस दौरे में कई यादें जी आया 
फिर से उस देवदारू के पेड़ की छाँवतले बैठ उस धूसर हरे रंग को निहार आया 

और कह आया उस कोठी / बंगले से - तुम यादों में हरे ही रहोगे। 


- नीरज मठपाल 
नवम्बर १२, २०१३ 

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