शनिवार, 2 जून 2007

सड़क

सड़क यातायात का अहम साधन। पर अभी जिन सड़कों के बारे में सोच रहा हूँ, वो यातायात का साधन कम, विचाररूपी ‘मोटर’ को ईंधन देती 'मशीन' ज्यादा लग रही हैं।

जीवन का सफ़र अनेकानेक सडकों से गुजरता है जिन पर हम कई बार माता – पिता, भाई बहन, नाते – रिश्तेदार, दोस्तों के साथ घूमते हैं। वहीं कई बार अकेले भी एक वैचारिक मस्तिष्क को लेकर चलते हैं। फिर कहीं पर एकांत देखकर सड़क किनारे बैठ जाते हैं, कुछ देर बातें करते हैं, कुछ सोचते हैं, फिर वापस वहीं आ जाते हैं जहाँ से चले थे। पर कुछ लेकर ही वापस आते हैं, चाहे वह आत्मबल या प्रसन्नता में वृद्धि का कारण बने या फिर ह्रास का। साथ में हम कुछ अच्छे या बुरे क्षणों को भी जी चुके होते हैं।

कुछ वर्ष पहले मैं द्वाराहाट, बेरीनाग, डीडीहाट की सडकों पर अपने माता – पिता, अग्रजों का हाथ पकड़े चलता था। बाल मन उन्ही क्षणों में प्रसन्न रहता है। उसे और कुछ सोचने की आवश्यकता ही नहीं होती। उसके बाद पिथौरागढ़ में भी यह बाल मन ही रहा, अपने परिवेश को शरीर में समावेशित होते देखता रहा, पर यही वह समय था जब विचारों के रौंदे हुए जल से व्यक्तित्व की जड़ें सींची जाने लगी थी। नैनीताल, घुड़दौड़ी (पौड़ी), दिल्ली, बंगलौर की सडकों से होते हुए पिछले एक साल से यह जल अमेरिका की सडकों पर आ पहुँचा है। आज भी इसके सींचने की शक्ति कम नहीं हुई, ना ही बाल मन की जिज्ञासाएँ उत्पन्न होना छोड़ सकी हैं। युवाओं की ऊर्जा, जोश और जीवनी शक्ति उस बाल मन में मिली, तो विचार प्रवाह में गति सी आ गयी।

स्थिर रहना या स्थिर विचारधारा का होना अच्छी बात है पर फिर भी कहीं कुछ है जो कहता रहता है, “मेरी तो कोई विचारधारा ही नहीं है”। मन – मस्तिष्क इस बात का खंडन करता है। लेकिन “सही क्या है?”, इसका निर्णय कौन करेगा? कहीं से स्वयम् ही उत्तर आया कि इसका निर्णय अतिसंक्षिप्त वैचारिक विश्लेषण ही कर सकता है। उत्तर मिला बहुत साधारण पर अपने में कई सदियों को समेटे हुए – “जड़ें तो स्थिर रहती हैं। समय के साथ साथ वो और भी गहरी होती चली जाती हैं। पर तना, पत्ती, फूल आदि का कार्य तो गतिमान रहना है। सिद्धांततः चीजें नहीं बदलती, पर समयानुसार उनके क्रियान्वयन में परिवर्तन आवश्यक है। यही एक गतिशील मन, गतिशील मस्तिष्क और गतिमान व्यक्तित्व की विचारधारा है।”

अभी शाम को ही एक सड़क पर चलते हुए पुनः अहसास हुआ – “सड़कें तो बदलती रहती हैं, पर हमारा चलना नहीं बदलता। गतिमान जीवन गतिमान ही रहता है।”

- जून २, २००७
नीरज मठपाल

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