बुधवार, 26 जनवरी 2011

खबर २०१०

स्थान : भारत गणराज्य, वर्ष : २०१०, कुछ खबरें :

[प्रस्तुत आंकडे इंटरनेट स्रोतों जैसे गूगल, विकी से लिए गए हैं एवं असलियत से थोडा इधर उधर हो सकते हैं]

१) जनवरी २,१६,१७,२२ - कोहरे के कारण ६ रेल दुर्घटनाएं - लगभग १५ की मौत, ६० से ऊपर घायल
२) जनवरी ३० - आंध्र प्रदेश में नाव डूबी - लगभग १२ मरे, २० लापता
३) फरवरी ५ - कश्मीर में मुठभेड़ - १७ भारतीय जवान शहीद
४) फरवरी १३ - पुणे में आतंकी हमला, बम विस्फोट - १७ मरे, ६० से ऊपर घायल
५) फरवरी १५ - बंगाल में नक्सलियों का हमला - २४ जवान मरे गए, कई लापता
६) फरवरी १७ - जलाऊं जिले में बस दुर्घटना - २२ की मौत
७) मार्च ४ - प्रतापगढ़ में मंदिर में भगदड़ - ६४ मरे, कई घायल
८) मार्च - कोलकाता में भवन में आग लगी - २४ की मौत
९) अप्रैल ३ - माओवादियों ने उड़ीसा में बस उड़ाई - १० पुलिस वाले मरे
१०) अप्रैल ६ – दांतेवाड़ा में नक्सली हमला – ७० जवानों की मौत
११) अप्रैल १३ - बंगाल में तूफ़ान - १४० से ऊपर मरे, ५००००० से ऊपर प्रभावित
१२) मई ७ - कश्मीर में मुठभेड़ - ७ मरे
१३) मई ८ - छत्तीसगढ़ में नक्सली हमला - ७ सी आर पी एफ ऑफिसर मरे
१४) मई १६ - छतीसगढ़ में माओवादी हमला - ६ ग्रामीण मरे
१५) मई १७ - दांतेवाडा में बस में विस्फोट, नक्सली हाथ - ४४ विशेष पुलिस कर्मी मरे
१६) मई १९ - तमिलनाडु में साइक्लोन - १० मरे, कई प्रभावित
१७) मई २१ - मंगलौर में एयर इंडिया का विमान दुर्घटनाग्रस्त – १५८ की मौत
१८) मई २८ - मेदिनीपुर रेल विस्फोट - १५ कि मौत, १५० से ऊपर घायल
१९) जून २ – गर्मी / लू का उत्तरी भारत में आतंक - १०० से ऊपर मरे
२०) जून १७ - महाराष्ट्र में भारी वर्षा - ४६ मरे
२१) जून २५ - पटना में ट्रक - बस दुर्घटना - १७ मरे, २५ घायल
२२) जून २६ - कश्मीर में मुठभेड़ - ५ मरे
२३) जून २९ - छत्तीसगढ़ में माओवादी हमला - २६ पुलिस वाले मरे
२४) जुलाई १९ - रेल दुर्घटना - ५० की मौत
२५) अगस्त १ - कश्मीर में मुठभेड़ - ६ मरे
२६) अगस्त ६ - लेह में बाढ़ - ११३ मरे, कई प्रभावित
२७) अगस्त १८ - कपकोट, उत्तराखंड में विद्यालय भवन गिरा - १७ मरे
२८) सितम्बर २० - शिवपुरी, मध्य प्रदेश में रेल दुर्घटना - २१ मरे, कई घायल
२९) अक्टूबर १० - बक्सर, बिहार में नाव डूबी – ३६ मरे
३०) अक्टूबर ११ – बुलंदशहर में बस नदी में गिरी – १८ मरे
३१) अक्टूबर ३० - बंगाल में नाव डूबी - १६ मरे, ७० लापता
३२) नवंबर १ - बंगाल में नाव दुर्घटना - ७४ मरे
३३) नवंबर २ - गुजरात में ट्रक दुर्घटना - १७ मरे
३४) नवंबर १५ - दिल्ली में इमारत गिरी - ६६ से ऊपर मरे
३५) नवंबर २१ - औरंगाबाद, बिहार में माओवादी हमला - ७ मरे
३६) दिसंबर २६ – बदायूं में बस ट्रक दुर्घटना - ३४ मरे
पुनश्च: २०११ का आरम्भ ही देखिये -
३७) जनवरी २०११ – शबरीमला, केरला में मंदिर भगदड़ - १०० से ऊपर मरे, कई घायल
पिछले कई वर्षों से तकरीबन इसी तरह की खबरें साल की सुर्ख़ियों में रहती हैं। इसके अतिरिक्त भी कुछ घटनायें रही साल २०१० की जैसे कि कुछ और भ्रष्टाचार के किस्से, राष्ट्रकुल खेल, सचिन के कमाल, आदि आदि, लेकिन जब २०१० का अवलोकन किया, तो ये दिल को दुखाने वाला ‘पैटर्न' मिला -

१) यातायात संबंधी दुर्घटनाएं - बस, ट्रक, नाव, दुपहिया, कार, विमान
२) आतंकवाद - कश्मीर में वर्षों से चल रहा आतंक, नक्सली, माओवादी
३) मानवीय भूलें - भगदड़, भवनों का गिरना / जलना
४) प्रकृति का प्रकोप – बाढ़, गर्मी / सूखा, तूफ़ान, भूकंप, सूनामी

ये वही समस्याएं हैं, जिनका वर्षों से निदान पाने की कोशिश में कभी एक कदम आगे बढ़ाया जाता है, तो अगले ही क्षण दो कदम पीछे खींच लिए जाते हैं। शायद हमारे पास लड़ने के लिए सामर्थ्य से ज्यादा ही चीजें हो गयी हैं और सब कुछ नियंत्रण में लाना हर बीतते साल के साथ मुश्किल होता जा रहा है। हम सभी के पास जब भी समय हो, दोष देने के लिए बहुत कुछ है - भ्रष्टाचार, जनसंख्या, भुखमरी, कुपोषण, अशिक्षा और न जाने क्या क्या। पर शायद एक चीज कुछ पीछे छूट गयी है - जीवन की कीमत। ये खबरें तो कम से कम इसी तरफ इशारा करती हैं। खबरें आती रहती हैं आज इतने मरे, कल उतने मरे। हम एक अखबार में कोई भी ‘टाईमपास' खबर पढ़ने की तरह उसे पढ़ जाते हैं (वो भी जरूरी नहीं), शेष उसका कुछ अर्थ नहीं। सरकार प्रयत्नशील है कि कुछ ख़बरें तो कम की जाएँ, लेकिन उन्हें भी नहीं पता कितनी खबरें कितनी नयी दिशाओं से आने का इंतज़ार कर रही हैं।

मौत का ये अट्टाहास कभी कान से हल्की हवा सा गुजर जाता है, कभी बिलकुल समीप से गुजरती रेल की तरह धड़धड़ाहट करता दिल दहला देता है। क्या हम कभी जीवन की कीमत समझेंगे?

- नीरज मठपाल
जनवरी २६, २०११

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

दैनन्दिनी

३६५ पृष्ठों के हिसाब - किताब
१२ महीनों के सुख - दुःख
१ बरस की रचनात्मकता
को चबा - चबा के
खा गयी कुछ ' जीबी की मैमोरी '
और कुछ ' रेडीमेड छोटे बड़े डब्बे '

- नीरज मठपाल
अक्टूबर ७, २०१०

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

समुद्र से उगता सूरज

अभी दो सप्ताह ही तो हुए जब शनिवार के दिन हमने तय किया कि कल सुबह सुबह सूर्य दर्शन पर निकला जाए। सबसे जरूरी था मौसम का हाल जानना क्योंकि पिछले दो बार सुबह सुबह सूर्य दर्शन तो हुए थे, लेकिन तब तक सूरज समुद्र से ५ फीट ऊपर आ चुका था। बादलों ने सूरज को छिपा लिया था, भले ही किरणें छनकर हम तक पहुँच रही थी, आँखों को एक बेहतरीन दृश्य देखने को मिला भी, किन्तु जैसे एक चीज थोड़ा अपूर्ण रह गयी हो। पिछले दोनों ही प्रयास ‘साउथ मियामी बीच’ पर किये गए थे। इस बार हमने तय किया कि ‘फोर्ट लॉडरडेल बीच’ से अपने को कृतार्थ किया जाये। रविवार की सुबह ५-४५ पर हमारी सवारी घर से निकल पड़ी। जब निकले थे, तो अँधेरे का साम्राज्य छाया हुआ था। जैसे जैसे मिनट की सुई आगे बढी, हल्की हल्की सफेदी सी छाने लगी। हम ६-१५ पर समुद्र तट के समीप पहुँच चुके थे, कार को पार्किंग में डालकर हम रेत से होते हुए समुद्र के बिलकुल पास जा पहुंचे। लहरों के साथ आती हुई अपार जलराशि का एक कोना हमारे पैरों से खेलने लगा। हमारे पैर भी स्वयं ही पानी से खिलवाड़ करने लगे। पर आँखों का ध्यान सुदूर उस रेखा पर ही था जहाँ पर सागर आकाश एक दूसरे का हाथ थामे खड़े थे। आकाश के रंग कुछ ऐसे बदल रहे थे जैसे भानु भास्कर के स्वागत में पहले से ही दमकने लगे हों।


घड़ी की सुईयां जैसे ही सात के आगे पहुँची, सागर आकाश के मिलन की लंबी रेखा नारंगी होने लगी, विशेषत: बीचों बीच का दृश्य ही निराला था।



फिर जैसे जैसे चंद्रमा की कलाएं हर तिथि के साथ चंद्रमा की गोलाई बदलती हैं, उसी तरह की गोलाईयों में सूर्यदेव बाहर निकलने लगे। अंतर इतना था कि जहाँ चंद्रदेव पूरे आकार में आने में १५ दिन लेते हैं, वहीं सूर्यदेव ने यह कार्य कुछ ही मिनटों में निपटा दिया। शायद उन्हें भी यह भान है कि मनुष्य को उनसे मिलने वाली ऊर्जा की कितनी आवश्यकता है। उन्हीं की किरणों के साथ सारे काम प्रारंभ होते हैं, उन्ही की किरणों के अस्त होने के साथ सारे काम रूकने से लग जाते हैं।
एक घंटा वो सुबह हमने उस महान ऊर्जाश्रोत के साथ बिताई। ऐसा प्रतीत हुआ कि शरीर में वास्तव में ही कुछ ऊर्जा संचरण हो गया हो। वैसे भी समय पर उठने से पूरा दिन ही सार्थक सा लगता है, फिर इस दिन तो बात ही कुछ और थी। सूर्य को नमस्कार कर हमने अपने कदम वापस घर की तरफ बढाये, पर उस दर्शन की यादें हमेशा दिमाग में ताजा रहेंगी।

आप इन चित्रों का आनंद लें, अभी के लिए अलविदा।
- नीरज मठपाल
अक्टूबर २, २०१०

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

हस्ताक्षर

आपका पद आपका पैसा
बोलेगा
आपके हस्ताक्षर का मूल्य क्या है?
लेखक के हस्ताक्षर
कुछ बोलते नहीं ।

- नीरज मठपाल
अक्टूबर १, २०१०