शनिवार, 21 अप्रैल 2007

दुविधा

सत्य की बलिवेदी पर
मोहपाश रिश्तों का
आत्म – सम्मान की कब्र पर
अभिलाषा सुख की
भुख़मरी के मुहाने पर
मेज पर सजे छत्तीस व्यंजन
शेयर बाजार में
भारतीय युवाओं के ख़ून पर
खिलखिलाती
विदेशी कम्पनियाँ।
ये वह देश तो नहीं
जहाँ मैं प्राणवायु चाहता था।
मुझे तो चाहिए थी
करोड़ों भारतीयों की छोटी सी मुस्कान।
पर मुस्कान कि लाश पर
चंद भारतीय मक्खियां भिनभिना रही हैं।
लाश भी
अब स्वाद देने लगी हैं।
जो दे मुझे सकून
वह स्वाद कहाँ से लाऊँ।
कर्त्तव्यपथ को सही रूप में
कैसे देखूँ और दिखाऊँ।

- नीरज मठपाल
अगस्त २६, २००३

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