शनिवार, 21 अप्रैल 2007

ये कैसा हृदय

यदि मैं एक प्रसन्न हृदय होता;
तो हृदय से बाहर ही होता।

भावनाएं जीवन कि कटु सत्य हैं;
या हैं एक मधुर असत्य।
हृदय का फैसला
हृदय के ही पक्ष में।

अवरोध
एक निकम्मी मजबूत दीवार;
दीवारें जो ढह ना सकी
युग सूचक के ढहने पर भी।

प्रेरणा थी मृतप्राय
श्वासें कहा गयी वो …
भोजन – नलिका के कोपभाजन
से त्रस्त
दीवारें सुस्ताना चाहें –
पर चाह अमिट क्यों?

क्या राख्न भी नसीब ना थी
उस हृदय के लिए;
शायद वो हृदय ही नही था।


- नीरज मठपाल
अक्टूबर १७, २००१

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